मुंबई: महाराष्ट्र विधानसभा ने गुरुवार को महिला किसानों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण विधेयक-२०२६ को सर्वसम्मति से पारित कर दिया। कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने सदन में यह विधेयक प्रस्तुत किया, जिसे सभी दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून खेती और उससे जुड़े विभिन्न कार्यों में योगदान देने वाली लाखों महिलाओं को अलग पहचान दिलाने के साथ-साथ उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में भी मदद करेगा।
भूमि के स्वामित्व के बिना भी मिलेगी महिला किसान की पहचान
इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब किसी महिला को किसान का दर्जा पाने के लिए उसके नाम पर कृषि भूमि होना आवश्यक नहीं होगा। यदि कोई महिला खेती या उससे जुड़े कार्यों में सक्रिय रूप से भाग ले रही है, तो उसे आधिकारिक रूप से महिला किसान माना जाएगा। इससे उन महिलाओं को भी पहचान मिलेगी जो लंबे समय से कृषि कार्य कर रही हैं, लेकिन भूमि उनके नाम पर नहीं है। सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की वास्तविक भूमिका को मान्यता देने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे महिला किसानों को सरकारी अभिलेखों में अलग पहचान मिलेगी और वे विभिन्न योजनाओं का लाभ आसानी से प्राप्त कर सकेंगी।
अनेक कृषि आधारित क्षेत्रों की महिलाओं को मिलेगा लाभ
विधेयक का दायरा केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा गया है। इसके अंतर्गत मत्स्य पालन, पशुपालन, कुक्कुट पालन, दुग्ध उत्पादन तथा लघु वन उपज संग्रह जैसे क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं को भी शामिल किया गया है। पात्र महिलाओं को महिला किसान प्रमाणपत्र प्रदान किया जाएगा। इस प्रमाणपत्र के आधार पर वे बैंक से ऋण, फसल बीमा, सरकारी अनुदान, कृषि प्रशिक्षण, आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी तथा अपनी उपज के बेहतर विपणन जैसी सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगी। इसके साथ ही महिलाओं के साथ किसी प्रकार का भेदभाव रोकने के लिए भी कानून में विशेष प्रावधान किए गए हैं।
ग्राम पंचायत के माध्यम से होगा आवेदन
महिला किसान प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए पात्र महिलाएं अपनी ग्राम पंचायत में आवेदन कर सकेंगी। आवेदन पर अंतिम निर्णय ग्राम सभा द्वारा लिया जाएगा। यदि किसी आवेदन को अस्वीकार किया जाता है, तो उसके स्पष्ट और उचित कारण बताना अनिवार्य होगा। शहरी क्षेत्रों में यह जिम्मेदारी नगर पंचायत की सामान्य सभा निभाएगी। आवेदन स्वीकृत होने के बाद अधिकतम पंद्रह दिनों के भीतर महिला किसान प्रमाणपत्र जारी करना अनिवार्य होगा।
पात्र महिलाओं को स्वतः भी मिल सकेगा प्रमाणपत्र
राज्य सरकार ने स्थानीय निकायों को यह अधिकार भी प्रदान किया है कि यदि कोई पात्र महिला किसी कारणवश आवेदन नहीं कर पाती है, तो उसकी पहचान कर उसे स्वतः महिला किसान प्रमाणपत्र जारी किया जा सके। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र महिला केवल प्रक्रियागत कारणों से इस योजना के लाभ से वंचित न रहे।
सहायता केंद्र और शिकायत निवारण की होगी व्यवस्था
विधेयक के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार विशेष सहायता केंद्र तथा शिकायत निवारण व्यवस्था स्थापित करेगी। इन केंद्रों के माध्यम से महिलाओं को आवेदन प्रक्रिया, प्रमाणपत्र प्राप्त करने और विभिन्न सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून महिला किसानों को औपचारिक पहचान देने, उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और कृषि क्षेत्र में उनकी भागीदारी को अधिक मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित होगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को नई पहचान मिलने के साथ-साथ कृषि विकास को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।
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