नई दिल्ली: देश में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी शुरुआत का असर अब जल संसाधनों पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। जून महीने में सामान्य से लगभग एक-तिहाई कम वर्षा दर्ज होने के कारण देश के कई प्रमुख जलाशयों का जलस्तर घट गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम वर्षा के साथ-साथ जल संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियां भी जल संकट को गंभीर बना रही हैं। ऐसे में कृषि, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आने वाले महीनों में इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
प्रमुख जलाशयों में क्षमता का केवल 26.4 प्रतिशत पानी
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 25 जून तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल जीवित भंडारण क्षमता का केवल 26.4 प्रतिशत पानी उपलब्ध था। यह स्तर पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है, हालांकि यह पिछले दस वर्षों के औसत के आसपास बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की शुरुआत कम जल भंडारण के साथ होने से यदि आगामी महीनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो सिंचाई और पेयजल आपूर्ति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
कई राज्यों में बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार राष्ट्रीय औसत के बजाय राज्यों की स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिन 24 राज्यों में प्रमुख जलाशय स्थित हैं, उनमें से 14 राज्यों में जल भंडारण सामान्य स्तर से कम दर्ज किया गया है। पश्चिम बंगाल, मिजोरम और कर्नाटक जैसे राज्यों में जलाशयों का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे पहुंच गया है। वहीं पूर्वी और दक्षिणी भारत के कई हिस्सों में जल संकट अधिक गंभीर होता दिखाई दे रहा है।
बड़े शहरों पर भी दिखने लगा असर
कम जल भंडारण का असर अब महानगरों तक पहुंच चुका है। कई शहरों में पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। यदि आगामी महीनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो अन्य शहरों में भी जलापूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते शहरीकरण और जल की बढ़ती मांग के बीच जलाशयों का कम भरना भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
कम वर्षा और अल नीनो का प्रभाव
मौसम संबंधी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा हुई। सबसे अधिक कमी मध्य भारत, पूर्वी भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने से दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ा है। इसी कारण मानसून के शुरुआती चरण में जलाशयों में अपेक्षित मात्रा में पानी एकत्र नहीं हो सका।
देश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में
उपलब्ध आकलनों के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह तक देश का लगभग 37 प्रतिशत क्षेत्र किसी न किसी स्तर के सूखे की स्थिति का सामना कर रहा था। दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर के कई हिस्से सबसे अधिक प्रभावित बताए गए हैं। स्थिति को देखते हुए कृषि क्षेत्र के लिए प्रभावित राज्यों और जिलों में आकस्मिक कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं ताकि किसानों को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।
केवल अच्छी वर्षा से नहीं होगा स्थायी समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई और अगस्त में सामान्य अथवा अच्छी वर्षा होती है तो इस वर्ष जलाशयों की स्थिति में सुधार संभव है। हालांकि उनका कहना है कि यह केवल अल्पकालिक राहत होगी। दीर्घकालिक समाधान के लिए जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन, वर्षा जल का संरक्षण, जल पुनर्चक्रण, भूजल का संतुलित उपयोग और कम पानी वाली कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
टिकाऊ कृषि और बेहतर जल प्रबंधन पर जोर
विशेषज्ञों ने कृषि में प्रति बूंद अधिक उत्पादन की अवधारणा अपनाने पर बल दिया है। उनका कहना है कि कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना, सिंचाई दक्षता में सुधार करना और जल संरक्षण को प्राथमिकता देना भविष्य के जल संकट से निपटने के लिए जरूरी होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल संसाधनों के प्रबंधन में समय रहते सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में कई क्षेत्रों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए टिकाऊ कृषि, प्रभावी जल नीति और संसाधनों के संतुलित उपयोग को देश की प्राथमिकता बनाना आवश्यक होगा।
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