नई दिल्ली: बरसात का मौसम बकरी पालन करने वाले किसानों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है और बकरे-बकरियां भरपूर चारा, दाना और खनिज मिश्रण खाती हैं। लेकिन कई बार पर्याप्त भोजन करने के बावजूद उनका वजन नहीं बढ़ता, शरीर कमजोर होने लगता है और वे बीमार दिखाई देने लगते हैं। पशु विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लक्षणों को सामान्य नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यह पेट में परजीवी कीड़े या अन्य बीमारियों का संकेत हो सकता है।
आंखों से पहचानें पेट के कीड़ों की समस्या
बरसात के मौसम में बकरियों के शरीर में खून चूसने वाले परजीवी तेजी से बढ़ सकते हैं। इनका असर सबसे पहले आंखों में दिखाई देता है। स्वस्थ बकरी की आंखों के अंदर का हिस्सा लाल या गुलाबी रंग का होता है। यदि आंखों का रंग हल्का गुलाबी होने लगे तो यह शरीर में परजीवी बढ़ने का संकेत हो सकता है। वहीं आंखों का रंग सफेद पड़ने लगे तो यह खून की कमी का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क कर उचित उपचार कराना चाहिए।
मल से भी मिलते हैं बीमारी के संकेत
बकरी के मल पर नियमित नजर रखने से कई बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है। स्वस्थ बकरी का मल गोल, चमकदार और सख्त होता है। यदि मल चिपका हुआ, गुच्छेदार या लेप जैसा दिखाई दे तो यह आंतों के संक्रमण या दस्त का संकेत हो सकता है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार कराना जरूरी है, ताकि बीमारी अन्य पशुओं में न फैले।
मूत्र के रंग पर भी रखें नजर
पशु विशेषज्ञों के अनुसार बकरी के मूत्र का रंग भी उसके स्वास्थ्य की जानकारी देता है। सामान्य स्थिति में मूत्र हल्के पीले रंग का होता है। यदि उसका रंग गहरा पीला हो जाए तो यह शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है। वहीं यदि मूत्र में लालपन दिखाई दे तो यह चोट या अन्य समस्या की ओर संकेत करता है। यदि मूत्र का रंग कॉफी जैसा गहरा हो जाए तो यह गंभीर संक्रमण का लक्षण हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है।
बरसात में रखें विशेष सावधानी
बरसात के मौसम में पशुओं को हमेशा साफ और सूखा स्थान उपलब्ध कराएं। पीने के लिए स्वच्छ पानी दें तथा गंदे और दलदली स्थानों पर चराने से बचें। समय-समय पर कृमिनाशक दवा और आवश्यक टीकाकरण भी कराते रहें।
नियमित निगरानी से बच सकता है नुकसान
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान रोजाना बकरियों की आंखों, मल, मूत्र, खाने की आदत और व्यवहार पर ध्यान दें तो अधिकांश बीमारियों की समय रहते पहचान की जा सकती है। इससे इलाज आसान होता है, पशुओं की मृत्यु दर कम होती है और बकरी पालन से होने वाली आय पर भी नकारात्मक असर नहीं पड़ता।
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