नई दिल्ली: भारत में मूंगफली को एक प्रमुख तिलहन फसल के रूप में देखा जाता है, जो न केवल देश भर के किसानों की आजीविका का एक अत्यंत मजबूत आधार है, बल्कि खाद्य तेल के कुल उत्पादन में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आगामी खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही देशभर में मूंगफली की वैज्ञानिक खेती की तैयारियां बहुत तेजी से शुरू हो गई हैं। कृषि वैज्ञानिक और विषय विशेषज्ञ लगातार किसानों को उन्नत किस्मों के चयन तथा आधुनिक तकनीकों से खेती करने की महत्वपूर्ण सलाह दे रहे हैं, ताकि कुल उत्पादन भी ज्यादा प्राप्त हो और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर हो सके। मूंगफली की खेती वैसे तो देश के कई अलग-अलग हिस्सों में बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन जिन किसानों ने आधुनिक और कीट-रोग प्रतिरोधी किस्मों को अपनाया है, वे पारंपरिक खेती की तुलना में बहुत अधिक लाभ कमा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंगफली की कुछ विशेष किस्में ऐसी विकसित की गई हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से भयानक कीट या विभिन्न रोग नहीं लगते हैं और इनमें तेल व प्रोटीन की मात्रा भी काफी अच्छी पाई जाती है, जिसके कारण अब पुरानी पारंपरिक किस्मों के मुकाबले इन नई उन्नत किस्मों की मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है।
मूंगफली की पांच प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं
कृषि वैज्ञानिकों ने आगामी खरीफ सीजन के लिए मूंगफली की पांच प्रमुख किस्मों को किसानों के लिए सबसे उपयुक्त और लाभदायक बताया है। इनमें सबसे पहले कोणार्क स्पेनिश किस्म आती है, जो ओडिशा और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें तेल की मात्रा उड़चास प्रतिशत व प्रोटीन उनतीस प्रतिशत होता है तथा यह एक सौ दस से एक सौ पंद्रह दिनों में तैयार होकर प्रति हेक्टेयर चौबीस क्विंटल तक उत्पादन प्रदान करती है। उत्तर भारत के किसानों के लिए अंबर किस्म को एक बेहतरीन विकल्प माना गया है, जिसकी उपज प्रति एकड़ दस से बारह क्विंटल तक होती है और बुवाई के लगभग एक सौ बीस दिन बाद फसल खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। वहीं कम समय में अधिक उत्पादन चाहने वाले किसानों के लिए गंगापुरी किस्म सबसे आदर्श मानी गई है, क्योंकि यह मात्र पंचाणवे से एक सौ दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसमें तेल की मात्रा लगभग पचास प्रतिशत तक पाई जाती है। इसके अलावा ज्योति किस्म को भी खरीफ के लिए सर्वोत्तम बताया गया है, जो मुख्य रूप से गुच्छों में फल देती है और बीस क्विंटल से अधिक उपज प्रदान करती है, जबकि उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच एम ए-10 यानी चित्रा किस्म तेजी से लोकप्रिय हो रही है, जिसमें कुल उत्पादन पच्चीस से तीस क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलता है और तेल की मात्रा अड़तालीस प्रतिशत के करीब होती है।
मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी और खेत प्रबंधन
मूंगफली की सफल खेती के लिए हल्की पीली दोमट मिट्टी को सबसे अधिक उपयुक्त और सर्वोत्तम माना जाता है। खेत की मिट्टी में जल निकासी की बहुत अच्छी व्यवस्था होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि बरसात के समय जलजमाव की स्थिति पैदा न हो सके। खेत की तैयारी के समय मिट्टी में गोबर की पुरानी सड़ी हुई खाद अच्छी तरह मिलाना बेहद जरूरी होता है, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता क्षमता में काफी बढ़ोतरी होती है। एक बार जब खेत पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसमें उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों की बुवाई कर देनी चाहिए। मूंगफली की यह फसल न केवल किसानों को अधिक उपज और लाभ देती है, बल्कि यह मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाती है, क्योंकि इसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य करती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकने में भी काफी मददगार साबित होती हैं।
किसानों की आय और भविष्य की संभावनाएं
कुल मिलाकर देखा जाए तो इन नई उन्नत किस्मों की मदद से मूंगफली अब सिर्फ एक पारंपरिक खेती की फसल नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के किसानों की आय का एक स्थायी और टिकाऊ जरिया बनती जा रही है। यदि आने वाले सीजन में मौसम अनुकूल रहता है और किसान कृषि वैज्ञानिकों द्वारा दी गई सलाहों का पूरी तरह पालन करते हैं, तो खरीफ सीजन में मूंगफली की खेती से बहुत बड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है।
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