खेती-किसानी

मखाना की खेती से किसानों को मिलेगा कम लागत में शानदार मुनाफा

Makhana cultivation will provide farmers with substantial economic returns at low cost

नई दिल्ली: भारत में मखाना एक अत्यंत लाभकारी जल आधारित नकदी फसल के रूप में तेजी से उभर रहा है, जो अपने औषधीय गुणों के साथ-साथ किसानों को उत्कृष्ट आर्थिक लाभ प्रदान करता है। इसे मुख्य रूप से देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों के दलदली क्षेत्रों तथा तालाबों में उगाया जाता है। भारत विश्व स्तर पर मखाना का प्रमुख उत्पादक देश है और इसमें बिहार राज्य की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है। हाल के वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण मखाना की वैश्विक मांग में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसी मांग को देखते हुए अब बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से मखाना की खेती करने की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

मखाना की खेती के लिए उपयुक्त वातावरण

मखाने का पौधा शांत तथा उथले जल स्रोतों जैसे तालाबों और बाढ़ग्रस्त दलदली भूभाग पर बहुत सहजता से पनपता है। इसकी सफल खेती के लिए लगभग डेढ़ से दो फीट गहराई वाले स्थायी जलप्रबंधन की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है। खेती की शुरुआत करने के लिए किसानों को फरवरी से मार्च महीने के दौरान बीजों को चौबीस से अड़तालिस घंटे तक पानी में भिगोकर जल निकाय में समान रूप से बिखेरना होता है। लगभग पंद्रह से बीस दिनों के भीतर बीजों से अंकुरण होकर पत्तियां पानी की ऊपरी सतह पर फैलने लगती हैं। इस फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे यह पूरी तरह से जैविक उत्पादन बनता है।

फसल की कटाई प्रसंस्करण तकनीक

मखाने की कटाई का कार्य मुख्य रूप से जुलाई से अगस्त महीने के दौरान किया जाता है, जब पके हुए बीज पानी के नीचे तलहटी में जमा हो जाते हैं। कुशल श्रमिकों द्वारा गोताखोरी करके तलहटी से बीजों को बाहर निकाला जाता है, जिसके बाद उन्हें सुखाकर, भूनकर और फोड़कर कुरकुरा सफेद मखाना तैयार किया जाता है। आधुनिक समय में मिनी प्रसंस्करण इकाइयों के उपयोग से इस कार्य में लगने वाले समय और श्रम में काफी बचत हो रही है। उन्नत तकनीकों और सही प्रबंधन के माध्यम से किसान प्रति हेक्टेयर लगभग पंद्रह से बीस क्विंटल तक मखाना प्राप्त कर सकते हैं, जिससे बाजार भाव के अनुसार सभी खर्च निकालकर प्रति हेक्टेयर डेढ़ से दो लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमाया जा सकता है।

मखाना उत्पादन को मिलने वाला सरकारी प्रोत्साहन

पोषण के दृष्टिकोण से मखाना प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम और विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट्स का एक बेहतरीन स्रोत माना जाता है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इसकी मांग निरंतर बढ़ रही है। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कृषि विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, उन्नत बीज और विपणन सहायता प्रदान कर रहे हैं। इसके साथ ही मत्स्य पालन विभाग द्वारा तालाबों को लीज पर देने और जल निकायों के सुंदरीकरण में विशेष मदद दी जा रही है। एक जिला एक उत्पाद जैसी सरकारी योजनाओं और विभिन्न राज्य स्तरीय अभियानों के माध्यम से मखाना की खेती आज किसानों के लिए एक अत्यधिक टिकाऊ और आय बढ़ाने वाला सशक्त जरिया बन चुकी है।

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