नई दिल्ली: देश में तेजी से बदलते कृषि परिदृश्य के बीच अब किसान परंपरागत खेती से हटकर औषधीय और सुगंधित पौधों की ओर रुख कर रहे हैं। खासकर जावा सिट्रोनेला (Java Citronella) जैसी फसलें किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। हर्बल और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच सिट्रोनेला से निकलने वाला तेल परफ्यूम, मच्छर भगाने वाले प्रोडक्ट, सैनिटाइज़र, रूम फ्रेशनर और हर्बल कॉस्मेटिक उत्पादों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। इसकी बाजार कीमत लगभग 1400 रुपये प्रति लीटर है, जो इसे अत्यधिक लाभकारी बनाती है।
सिट्रोनेला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक बार लगाने के बाद लगातार पांच साल तक उत्पादन देती है। पहले साल में प्रति हेक्टेयर 150-200 किलो और इसके बाद के वर्षों में 200–300 किलो तक तेल मिल सकता है। इस फसल में रोगों और कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे जोखिम और खर्च दोनों घटते हैं। यही वजह है कि यह खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी सिद्ध हो रही है। मिट्टी और जलवायु की बात करें तो बलुई दोमट या सामान्य दोमट मिट्टी सिट्रोनेला के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसका पीएच मान 6 से 7.5 के बीच हो तो सबसे अच्छा रहता है, हालांकि हल्की अम्लीय या क्षारीय भूमि में भी इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। देश में इसकी कई उन्नत किस्में विकसित की जा चुकी हैं जैसे कि सी-5, सी-2 और बायो-13, जिनमें तेल की मात्रा 0.80 से लेकर 1.20 प्रतिशत तक होती है।
सिट्रोनेला की खेती के लिए खेत की दो-तीन बार गहरी जुताई के बाद 20–25 टन गोबर की खाद और संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मिलाकर तैयार किया जाता है। इसकी बुवाई स्लिप्स के माध्यम से की जाती है, जिन्हें पुराने पौधों से तैयार किया जाता है। बुवाई के लिए फरवरी-मार्च या जुलाई-अगस्त का समय अनुकूल होता है। रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करनी होती है और गर्मियों में हर 10-15 दिन तथा सर्दियों में 20-30 दिन पर पानी देना जरूरी होता है। वर्षा ऋतु में अलग से सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहती, लेकिन जलभराव से बचाव बेहद जरूरी है।
फसल तैयार होने पर इसकी पत्तियों से सुगंधित तेल निकाला जाता है, जिसमें स्टीम डिस्टिलेशन या हाइड्रो डिस्टिलेशन तकनीक का प्रयोग होता है। एक बार की प्रक्रिया में लगभग 3 से 4 घंटे का समय लगता है और इससे पूरे वर्ष में औसतन चार बार कटाई के बाद 150 से 250 किलो प्रति हेक्टेयर तेल प्राप्त होता है। पहले साल में यह फसल लगभग 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक का शुद्ध लाभ देती है, जबकि अगले वर्षों में यह मुनाफा बढ़कर 2 लाख रुपये या इससे अधिक भी हो सकता है। कम लागत, कम जोखिम और बाजार में निरंतर बढ़ती मांग को देखते हुए सिट्रोनेला की खेती अब उन किसानों के लिए लाभदायक विकल्प बनती जा रही है, जो पारंपरिक कृषि से परे जाकर अपनी आय को स्थायी और समृद्ध बनाना चाहते हैं।
