खेती-किसानी

सौर ऊर्जा किसानों के लिए बन सकती है तकनीक से तरक्की का जरिया

नई दिल्ली: देश में तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग और पारंपरिक स्रोतों की सीमाओं के बीच सौर ऊर्जा खेती-किसानी के लिए एक व्यवहारिक और लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बिजली की आपूर्ति अनियमित है या पूरी तरह अनुपलब्ध है, वहां सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण खेती को न केवल आसान बना रहे हैं, बल्कि किसानों की लागत को भी काफी हद तक कम कर रहे हैं। डीजल और पेट्रोल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी से जहां सिंचाई और खेत प्रबंधन में खर्चा बढ़ रहा है, वहीं सोलर यंत्र किसानों को राहत पहुंचा रहे हैं।

सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप अब खेतों की सिंचाई के लिए एक बेहतरीन समाधान बन गए हैं। सोलर पंप प्रणाली में सौर पैनल, मोटर, नियंत्रक और ऑन-ऑफ स्विच जैसी सुविधाएं होती हैं। यह प्रणाली सूर्य की रोशनी को बिजली में बदलती है, जिससे बिना डीजल या बाहरी बिजली के पानी की आपूर्ति संभव हो जाती है। उदाहरण के लिए, 1000 वॉट का सोलर पंप एक दिन में लगभग 40,000 लीटर पानी की सिंचाई क्षमता रखता है, जिससे करीब दो एकड़ जमीन को आसानी से सींचा जा सकता है। इसके मुकाबले डीजल पंप से हर साल लगभग 45,000 रुपये की बचत होती है।

खेती में उपज के बाद कटाई और भंडारण के दौरान होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अब सोलर ड्रायर का भी उपयोग बढ़ रहा है। यह अनाज, फल, सब्जियों और मसालों को जल्दी और सुरक्षित तरीके से सुखाने में मदद करता है। पारंपरिक तरीकों की तुलना में सौर ड्रायर नमी और कीट प्रकोप से फसल को बचाकर गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू स्तर पर भी आलू चिप्स, हरी पत्तेदार सब्जियों और अन्य मसालों को सुखाने के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा खेतों की सुरक्षा के लिए सोलर फेंसिंग तकनीक काफी उपयोगी साबित हो रही है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों में कारगर है जहां आवारा पशु या जंगली जानवर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। सौर ऊर्जा से संचालित यह बाड़ बिना किसी नुकसान के पशुओं को खेतों से दूर रखती है। एक एकड़ खेत के लिए इसकी लागत लगभग 45,000 से 50,000 रुपये आती है, जिस पर कई राज्य सरकारें अनुदान भी देती हैं।

रासायनिक छिड़काव के लिए सोलर स्प्रेयर भी किसानों की मेहनत और लागत दोनों को घटा रहे हैं। इन्हें चार्ज करके घंटों तक उपयोग किया जा सकता है और इनकी कीमत भी तुलनात्मक रूप से कम है, जो 3,000 से 5,000 रुपये के बीच आती है। इसमें भी सरकारी अनुदान की व्यवस्था है, जिससे छोटे किसान भी इसे अपना सकते हैं। सरकार भी किसानों को सौर ऊर्जा के उपकरणों से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इनमें प्रमुख योजना है प्रधानमंत्री कुसुम योजना, जिसके तहत 3 से 10 हॉर्सपावर तक के सोलर पंप पर कुल लागत का 75 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। इस योजना में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों मिलकर किसानों को वित्तीय सहायता देती हैं।

सोलर यंत्रों का एक और बड़ा फायदा यह है कि इनके रखरखाव की लागत बहुत कम है और इन्हें लंबे समय तक बिना बार-बार मरम्मत के इस्तेमाल किया जा सकता है। इतना ही नहीं, किसान सोलर पैनल से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में भेजकर आय का अतिरिक्त स्रोत भी बना सकते हैं। इन तमाम कारणों से सौर ऊर्जा आधारित खेती देश के ऊर्जा संकट को हल करने, किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती को पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

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