गर्मियों में मछली पालन: बीमारियों से बचाव के उपाय

वाराणसी: भारत में मछली पालन सालभर किया जाता है और इसका कोई निश्चित मौसम नहीं होता, लेकिन बदलते मौसम के साथ मछलियों की देखभाल का तरीका बदलना बेहद जरूरी हो जाता है। विशेष रूप से गर्मियों में बढ़ते तापमान के कारण मछलियों में बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। मत्स्य विशेषज्ञों के अनुसार, 35 डिग्री से अधिक तापमान मछलियों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है, जिससे उनकी सेहत बिगड़ती है और कई बार मौत तक हो जाती है।

गर्मियों में फीड और तालाब प्रबंधन जरूरी

मत्स्य विशेषज्ञों का कहना है कि मछलियों को स्वस्थ रखने के लिए तालाब में प्राकृतिक भोजन यानी प्लवक का संतुलित उत्पादन बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए खाद को तय मात्रा और चरणबद्ध तरीके से डालना चाहिए। साथ ही चारे की बर्बादी रोकने के लिए पेलेट चारे का इस्तेमाल करना अधिक फायदेमंद होता है।

अगर तालाब के पानी का रंग गहरा हरा, भूरा या हरा-भूरा हो जाए या सतह पर शैवाल की परत दिखने लगे, तो तुरंत चारा और खाद डालना बंद कर देना चाहिए। इसके अलावा पानी के अम्लीय-क्षारीय स्तर की नियमित जांच जरूरी है, क्योंकि दिन और रात के समय इसमें काफी उतार-चढ़ाव होता है। संतुलन बनाए रखने के लिए चूना, फिटकरी और जिप्सम का उपयोग किया जा सकता है।

अधिक मछली और चारे से बढ़ता है खतरा

विशेषज्ञों ने मछली पालकों को चेतावनी दी है कि अधिक उत्पादन के लालच में तालाब में ज्यादा मछलियां डालना या जरूरत से ज्यादा चारा और खाद देना नुकसानदायक हो सकता है। इससे न केवल लागत बढ़ती है बल्कि पानी की गुणवत्ता भी खराब होती है।

गर्मियों में तापमान और अम्लीय-क्षारीय स्तर बढ़ने के साथ पानी में विषैले तत्वों का प्रभाव भी बढ़ जाता है, जिससे मछलियों पर तनाव पड़ता है और बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए तालाब में पर्याप्त हवा का संचार बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए नमक, जिप्सम या फिटकरी का सीमित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान समय पर सावधानी बरतें और तालाब के पानी व चारे का सही प्रबंधन करें, तो गर्मियों में भी मछली पालन लाभदायक और सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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