खेती-किसानी

अल नीनो में फसलों को बचाने के लिए अपनाएं वैज्ञानिक खेती

El Nino Impact on Agriculture

नई दिल्ली: देश में अल नीनो की आशंका के बीच कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सावधानी बरतने और वैज्ञानिक खेती अपनाने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो सक्रिय होने पर मानसून कमजोर पड़ जाता है, जिससे वर्षा में कमी, भीषण गर्मी, मिट्टी में नमी की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की वृद्धि, उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है। इसके साथ ही फसलों में कीटों और रोगों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ जाता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

अल नीनो से क्यों बढ़ जाता है खेती पर संकट

अल नीनो एक वैश्विक मौसमीय चक्र है, जो वर्षा के सामान्य पैटर्न को प्रभावित करता है। इसके सक्रिय होने पर भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है और कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होती है। पर्याप्त पानी नहीं मिलने से फसलों की बढ़वार रुक जाती है, पौधे कमजोर होने लगते हैं और उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। कम नमी और अधिक तापमान की स्थिति खेतों में हानिकारक कीटों तथा विभिन्न रोगों के फैलने के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करती है, जिससे फसल सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन जाती है।

रस चूसने वाले कीट बढ़ा देते हैं नुकसान

कृषि विज्ञान केंद्र, नरकटियागंज, पश्चिमी चंपारण के प्रमुख डॉ. आर. पी. सिंह के अनुसार सूखे और गर्म मौसम में कई प्रकार के हानिकारक कीट तेजी से फैलते हैं। उन्होंने बताया कि माहू कीट सोयाबीन और दलहनी फसलों की कोमल पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है। वहीं सफेद मक्खी मिर्च और कपास की फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ विषाणुजनित रोग भी फैलाती है। इसके अलावा तंबाकू की इल्ली पत्तियों को खाकर पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता को प्रभावित करती है। धान और मक्का में तना छेदक कीट तनों को भीतर से नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे सूखने लगते हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आती है।

सूखे मौसम में बढ़ता है रोगों का खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो के दौरान कई गंभीर रोग भी तेजी से फैल सकते हैं। सफेद मक्खी के माध्यम से फैलने वाला पत्ती सिकुड़न विषाणु रोग मिर्च और कपास की फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इसी प्रकार मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों में पीला मोज़ेक रोग तेजी से फैलता है, जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और दानों का विकास प्रभावित होता है। यदि लंबे सूखे के बाद अचानक तेज वर्षा हो जाए तो धान में पत्ती झुलसा रोग का खतरा भी बढ़ जाता है। वहीं मिट्टी में सक्रिय फफूंद पौधों की जड़ों को संक्रमित कर उन्हें सड़ा सकते हैं, जिससे पौधे अचानक मुरझाकर नष्ट हो जाते हैं।

धान और गन्ने की फसल पर सबसे अधिक असर

डॉ. आर. पी. सिंह के अनुसार धान और गन्ना ऐसी फसलें हैं जिन्हें पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। वर्षा की कमी होने पर धान में कल्ले कम निकलते हैं और बालियों में दानों का भराव प्रभावित होता है। इससे उत्पादन में कमी आती है। वहीं गन्ने की फसल पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर अपेक्षित लंबाई और मोटाई प्राप्त नहीं कर पाती। गन्ने में रस की मात्रा और चीनी की प्रतिशतता भी कम हो जाती है। सिंचाई के लिए किसानों को अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है।

वैज्ञानिक उपाय अपनाकर कम किया जा सकता है नुकसान

विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशी दवाओं से उपचार अवश्य करें, ताकि शुरुआती रोगों से बचाव हो सके। सूखा सहन करने वाली उन्नत किस्मों का चयन करना, खेत में फसल अवशेषों से मिट्टी को ढककर नमी बनाए रखना तथा पानी की बचत करने वाली सिंचाई तकनीकों को अपनाना भी लाभदायक रहेगा। धान की सीधी बुवाई तथा गन्ने में टपक सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से पानी की खपत कम की जा सकती है। इसके साथ ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए और नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग करने से बचना चाहिए।

नियमित निगरानी से बचाई जा सकती है फसल

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए ताकि कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नियंत्रण के उपाय किए जा सकें। कीटों की संख्या पर निगरानी रखने के लिए फेरोमोन प्रपंच और पीले चिपचिपे प्रपंच जैसे उपाय भी प्रभावी माने जाते हैं। समय रहते वैज्ञानिक सलाह और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर किसान अल नीनो जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

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