नई दिल्ली: सितंबर का महीना न गर्मियों की तरह होता है और न ही पूरी तरह ठंडी सर्दियों की तरह। इस दौरान मौसम अचानक बदलता है और अक्टूबर तक आते-आते सर्दी दस्तक दे देती है। यही वह समय है जब पशुपालकों को अपने पशुओं जैसे गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों की विशेष देखभाल करनी पड़ती है। एनिमल एक्सपर्ट्स का कहना है कि बदलते मौसम में पशुओं का स्ट्रेस (तनाव) बढ़ता है, जिससे दूध उत्पादन और ग्रोथ पर सीधा असर पड़ता है। कई बार पशु बीमार हो जाते हैं, जिससे इलाज पर होने वाला खर्च पशुपालकों की लागत बढ़ा देता है। इस तरह बदलते मौसम में पशुपालन एक काफी चुनौती भरा कार्य हो जाता है।
बदलते मौसम में पशुपालन और चुनौतियाँ
पशु चिकित्सकों के अनुसार, अक्टूबर में ठंड की शुरुआत के कारण दुधारू पशुओं पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। यदि समय रहते तैयारी न की जाए तो:
- दूध का उत्पादन घट सकता है।
- पशु की प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- थैनेला, पेट के कीड़े और बाहरी परजीवियों जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
- बार-बार बीमार पड़ने से पशुपालकों का दवा और इलाज पर खर्च बढ़ जाता है।
पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पशुपालक अभी से तैयारी शुरू कर दें तो सर्दी के मौसम में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।
- अक्टूबर से पहले ही पशुओं को ठंड से बचाने की व्यवस्था करें।
- भैंसों को हीट में आने पर समय पर गाभिन कराएं।
- बच्चा देने के 60-70 दिन बाद यदि पशु हीट में न आए तो तुरंत जांच कराएं।
- गाय-भैंस को जल्दी हीट में लाने के लिए मिनरल मिक्चर खिलाएं।
- बाहरी कीड़ों से बचाने के लिए नियमित दवा का छिड़काव करें।
- थैनेला रोग और पेट के कीड़े रोकने के लिए एक्सपर्ट की सलाह पर दवा दें।
बदलते मौसम में पशुपालन और चारे का प्रबंध
बदलते मौसम में पशुपालन काफी हद तक उचित भोजन पर भी निर्भर करती है। पशुपालकों के लिए सर्दियों में पर्याप्त हरे चारे की व्यवस्था करना भी जरूरी है। इसके लिए अक्टूबर में कुछ विशेष किस्मों की बिजाई करने की सलाह दी गई है।
- बरसीम की किस्में: बीएल 10, बीएल 22 और बीएल 42
- जई की किस्में: ओएस 6, ओएल 9 और कैन्ट
- बरसीम की बिजाई सरसों, जई या राई के साथ करने से चारे की पौष्टिकता और उपज दोनों बढ़ जाती है।
- नई जमीन में बरसीम बोते समय राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार करना न भूलें।
बछड़ों की देखभाल
विशेषज्ञों का कहना है कि बछड़े को बैल बनाने के लिए छह महीने की उम्र में ही बधिया करा देना चाहिए। इससे वह अधिक मजबूत बनता है और पशुपालक को लंबे समय तक फायदा देता है।
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