पशुपालन

जुलाई में मॉनसून के साथ बढ़ी पशुओं में पेट खराब होने की समस्या, जानिए कारण और बचाव के उपाय

नई दिल्ली: जुलाई की शुरुआत के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में मॉनसून सक्रिय हो चुका है। कहीं लगातार तो कहीं रुक-रुककर बारिश हो रही है। खेती-किसानी के लिए यह मौसम जितना लाभदायक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण है पशुपालकों के लिए। खासकर जब बात दुधारू पशुओं की हो, तो इस मौसम में उनकी देखभाल और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है। इस समय सबसे आम और गंभीर समस्या है पशुओं में पेट खराब होना, जिसे आम भाषा में अफरा कहा जाता है। बरसात के मौसम में यह समस्या तेजी से बढ़ जाती है। पशुपालन विशेषज्ञों के अनुसार, जुलाई खासतौर पर भैंसों के प्रजनन काल का समय होता है, जब उन्हें अधिक पोषण की जरूरत होती है। ऐसे में चारा, दाना और मिनरल्स की मात्रा बढ़ा दी जाती है, लेकिन कई बार यह अतिरिक्त खुराक ही पेट की गड़बड़ी का कारण बन जाती है।

दूध और बच्चे देने वाले पशुओं को अधिक प्रोटीन और ऊर्जा की जरूरत होती है, जिसे पूरा करने के लिए अक्सर रसदार हरा चारा जैसे रिजका और बरसीम दिया जाता है। साथ ही गेहूं, मक्का, बाजरा जैसे स्टार्च वाले अनाज भी उनकी खुराक में शामिल होते हैं। लेकिन यदि इनका संतुलन बिगड़ जाए या अचानक खुराक में बदलाव हो, तो पशु का पाचन तंत्र गड़बड़ा जाता है।

जब पशु को अफरा हो जाता है, तो उसके पेट के बाएं हिस्से में फूलापन नजर आता है। पेट का आकार सामान्य से बड़ा दिखने लगता है। गैस बढ़ने से रूमन पर दबाव पड़ता है, जिससे डायाफ्राम सिकुड़ने लगता है और पशु को सांस लेने में तकलीफ होती है। पशु मुंह खोलकर सांस लेता है, जीभ बाहर निकाल लेता है, बेचैन हो जाता है और सुस्त दिखता है। साथ ही वह बार-बार थोड़ा-थोड़ा गोबर या पेशाब करता है। समय पर इलाज नहीं होने पर अफरा जानलेवा भी हो सकता है। ऐसे में सबसे पहले पशु को खाना देना बंद कर देना चाहिए। उसे ढलान वाली जगह पर खड़ा करें ताकि उसका सिर ऊपर और पिछला हिस्सा नीचे रहे, जिससे पेट में बनी गैस का दबाव डायाफ्राम पर कम हो जाए और सांस लेने में आसानी हो।

घरेलू उपचार के तौर पर बलोटोसील 100 एमएल, तारपीन का तेल 50 से 60 एमएल और सरसों का तेल 100 एमएल दिया जा सकता है। इसके अलावा 50 ग्राम हींग, 20 ग्राम काला नमक और एक लीटर छाछ मिलाकर पशु को पिलाने से भी राहत मिलती है। पशुपालन विभाग का कहना है कि बरसात में पशुओं की देखभाल में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। खासकर उनके चारे और दाने में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। ज्यादा देर तक उन्हें गीली या कीचड़ भरी जगहों पर नहीं बांधना चाहिए। मौसम में नमी और चारे में बदलाव पेट संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। पेट सही न रहने पर पशु न तो खाता है, न ही दूध दे पाता है। इसलिए छोटे से लक्षण पर भी पशुपालकों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। बरसात का यह मौसम पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आता है, लेकिन सही जानकारी और समय पर उठाए गए कदम पशुओं को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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