खेती-किसानी

धान की सीधी बुआई तकनीक से किसानों को मिलेगा कम लागत में अधिक लाभ

dhan ki sidhi buwai

लखनऊ: भारत के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में इन दिनों एक नई तकनीक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है, जिसे धान की सीधी बुआई तकनीक कहा जाता है। यह पद्धति पारंपरिक पौधशाला और रोपाई की जगह अब धान की सीधी बीजारोपण का एक आधुनिक, कम खर्चीला और समय के अनुकूल विकल्प बनती जा रही है। इस नवीन तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धान के पौधे के लिए पौधशाला तैयार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि इसके बजाय बीजों को सीधे मुख्य खेत में बोया जाता है, जिससे शारीरिक श्रम, समय और अमूल्य संसाधनों की भारी बचत होती है। परंपरागत रोपाई की तुलना में इस तकनीक को अपनाने से प्रति एकड़ लगभग 6 हजार रुपये की लागत में सीधी कमी आती है और इसके साथ ही सिंचाई के लिए पानी की खपत भी लगभग 30 प्रतिशत तक घट जाती है।

धान बीजारोपण की विभिन्न विधियां और उनकी कार्यप्रणाली

खेत में धान की फसल लगाने के लिए मुख्य रूप से तीन तरीकों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें पारंपरिक रोपाई, सूखा बीजारोपण और गीला बीजारोपण शामिल हैं। यह तीनों पद्धतियां खेत की जुताई, बीज डालने के तरीकों और फसल प्रबंधन के आधार पर एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न होती हैं। सूखे बीजारोपण की विधि में धान के सूखे बीजों को खेत की अच्छी तैयारी के बाद बोया जाता है, जिसमें या तो पारंपरिक जुताई की जाती है या फिर शून्य जुताई तकनीक अपनाई जाती है। इस प्रक्रिया में बीजों को खेत में या तो आधुनिक मशीन की मदद से पंक्तियों में बोया जाता है या फिर विशेष पद्धति से मिट्टी में डाला जाता है। दूसरी ओर, गीली विधि में पहले से अंकुरित किए गए बीजों को कीचड़ वाली मिट्टी में बोया जाता है। यदि इन अंकुरित बीजों को मिट्टी की ऊपरी सतह पर बोया जाता है तो इसे वायुजीवी गीला बीजारोपण कहते हैं, जबकि बीजों को मिट्टी में थोड़ा गहराई पर बोने की स्थिति में इसे अवायुजीवी गीला बीजारोपण कहा जाता है। इन दोनों ही विधियों में बीजों को खेत में छिड़क कर या विशेष बीजारोपण यंत्रों के माध्यम से बोया जाता है।

एरोबिक खेती के लिए आवश्यक पोषक तत्व और प्रबंधन

जल संसाधनों की निरंतर घटती उपलब्धता और सिंचाई की बढ़ती चुनौतियों के बीच वायुजीवी धान की खेती कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भविष्यवादी समाधान बनती जा रही है। यह तकनीक वर्षा पर आधारित और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में धान की फसल की बेहतर पैदावार सुनिश्चित कर रही है। इस विधि के अंतर्गत अधिक उपज देने वाली उपयुक्त किस्मों का चयन करके, खेत में हल्की सिंचाई के बाद विभिन्न कृषि यंत्रों के माध्यम से 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से सीधी बुआई की जाती है। इस प्रकार की बुआई के लिए वर्ष का जून महीना सबसे अधिक उपयुक्त समय माना जाता है, जिसमें बीजों को खेत में 25×10 सेंटीमीटर की निर्धारित दूरी पर बोया जाता है ताकि प्रत्येक पौधे को पर्याप्त स्थान और पोषण मिल सके। इसके साथ ही अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए पोषक तत्वों की सटीक मात्रा देना बेहद आवश्यक होता है, जिसके अंतर्गत 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस, 60 किलोग्राम पोटाश और 25-30 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर देने की सिफारिश की जाती है।

किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण में तकनीक का योगदान

कृषि विभाग और विभिन्न वैज्ञानिक संस्थान इस नई तकनीक को व्यापक रूप से बढ़ावा देने के उद्देश्य से किसानों को निरंतर प्रशिक्षण, मशीनरी सहायता और वित्तीय अनुदान प्रदान कर रहे हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बिहार जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में इस तकनीक का प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का स्पष्ट रूप से मानना है कि यदि सही किस्मों और उचित कृषि क्रियाओं को अपनाया जाए, तो यह तकनीक न केवल कम पानी वाले क्षेत्रों में अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होगी, बल्कि इससे किसानों की कुल आय में वृद्धि करने और खेती को अधिक टिकाऊ व पर्यावरण के अनुकूल बनाने में भी बड़ी मदद मिलेगी। यह सीधी बुआई तकनीक पुरानी पारंपरिक पद्धतियों की तुलना में कहीं अधिक व्यावहारिक, किफ़ायती और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सक्षम समाधान बनकर उभर रही है, जो आने वाले समय में देश की खाद्य सुरक्षा और किसान कल्याण को सुदृढ़ करने में मुख्य भूमिका निभाएगी।

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