कानपुर: आज के समय में भारतीय कृषि के सामने सबसे गंभीर चुनौती मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की लगातार हो रही कमी और भूमि की उपजाऊ क्षमता का गिरना है। अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी बेजान होती जा रही है, वहीं बढ़ती आबादी के कारण जमीन का बंटवारा होने से किसानों के पास खेती की जोत भी लगातार छोटी होती जा रही है। इस बदलते परिदृश्य में कम जमीन पर अधिक और टिकाऊ उत्पादन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
कानपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति के. विजयेंद्र पांडियन ने भविष्य में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों को लेकर किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को आगाह किया। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम, अनिश्चित वर्षा और बढ़ती खेती लागत को देखते हुए अब परंपरागत खेती के तरीकों में बदलाव जरूरी हो गया है।
जैविक खेती और फसल चक्र पर जोर
कुलपति पांडियन ने किसानों को खेती की लागत कम करने के लिए जैविक खेती अपनाने, सही फसल चक्र लागू करने और कीटों से बचाव के लिए आधुनिक कीट प्रबंधन तकनीकों का उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो रासायनिक खादों पर निर्भरता अपने आप कम हो जाएगी। इससे किसानों का खर्च घटेगा और मिट्टी की सेहत के साथ-साथ उसकी उत्पादक क्षमता में भी बड़ा सुधार होगा।
मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ाओ संकल्प अभियान
विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित ‘मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ाओ संकल्प अभियान’ का मुख्य उद्देश्य मिट्टी की खोई हुई उर्वरता को फिर से जीवित करना है। कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि आज सबसे बड़ी जरूरत मिट्टी को रसायनों से मुक्त करने और किसानों को आधुनिक तकनीकों के प्रति जागरूक करने की है। इस मौके पर कृषि क्षेत्र में आ रही नई चुनौतियों और उनके वैज्ञानिक समाधानों पर विस्तार से चर्चा की गई।
इसी कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2026 का नया कृषि कैलेंडर भी जारी किया गया, जिससे किसानों को पूरे साल सही समय पर उपयुक्त तकनीक अपनाने में मदद मिलेगी। अभियान का लक्ष्य एक ऐसी प्राकृतिक रूप से मजबूत खेती व्यवस्था विकसित करना है, जो किसानों को अधिक मुनाफा दिला सके।
ड्रिप इरिगेशन और हाइड्रोपोनिक्स अपनाने की सलाह
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल झांसी कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार डॉ. एस. के. सिंह ने कहा कि आज के दौर में तकनीक के बिना खेती में आत्मनिर्भरता संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि भारत का पहला कृषि विज्ञान केंद्र वर्ष 1974 में पांडिचेरी में स्थापित हुआ था और तब से कृषि विज्ञान ने लंबा सफर तय किया है।
उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की कि प्रयोगशालाओं में विकसित नई तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाए। डॉ. सिंह ने विशेष रूप से ड्रिप इरिगेशन और हाइड्रोपोनिक्स जैसी तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया, जो कम पानी में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं।
मिट्टी के जीवाणु हैं खेती की असली ताकत
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारत के लगभग 140 मिलियन हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी में मौजूद मित्र जीवाणुओं का संरक्षण बेहद जरूरी है। निदेशक प्रसार डॉ. आर. के. यादव ने बताया कि एक ग्राम मिट्टी में करीब 6,000 से अधिक उपयोगी जीवाणु होते हैं, जो फसल उत्पादन और पर्यावरण संतुलन के लिए वरदान हैं।
इसके साथ ही किसानों की आय बढ़ाने के लिए स्थानीय मंडियों के उपयोग, फसल कटाई के बाद प्रोसेसिंग और मूल्य संवर्धन पर ध्यान देने की सलाह दी गई। बांदा कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. एन. के. वाजपेई ने किसानों को प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित करने के नए तरीकों पर भी अपने विचार रखे।
सस्टेनेबल खेती ही भविष्य का रास्ता
विशेषज्ञों ने दो टूक कहा कि मिट्टी की जान ऑर्गेनिक कार्बन है। जब मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ेगी, तो वह लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहेगी। जैविक खेती अपनाकर न केवल खेती की लागत घटाई जा सकती है, बल्कि रसायनों से मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक अनाज का उत्पादन भी संभव है।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कृषि को सस्टेनेबल मॉडल की ओर ले जाया जाए, जहां पैदावार भी अधिक हो और प्रकृति का संतुलन भी बना रहे। यही रास्ता किसानों की आय बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सबसे कारगर साबित होगा।
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