नई दिल्ली: भारत में धनिया की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। यह प्रमुख मसाला फसलों में शामिल है और इसकी खेती मुख्य रूप से हरी पत्तियों तथा बीजों के लिए की जाती है। देश में मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश धनिया उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र माने जाते हैं। धनिये की खासियत यह है कि किसान बाजार की मांग के अनुसार इसकी खेती केवल पत्तियों के लिए, केवल बीजों के लिए या दोनों के लिए कर सकते हैं। कम समय में तैयार होने वाली पत्ती वाली फसल किसानों को अपेक्षाकृत जल्दी आमदनी देने में सक्षम होती है, जबकि बीजों के लिए फसल को अधिक समय तक खेत में रखना पड़ता है।
कम समय में तैयार होती है धनिये की पत्ती वाली फसल
हरी धनिया की खेती करने वाले किसानों को अपेक्षाकृत कम समय में उत्पादन मिलने लगता है। सामान्यतः पत्ती वाली फसल लगभग 40 से 55 दिनों में कटाई योग्य हो सकती है, हालांकि यह अवधि किस्म, मौसम, मिट्टी और प्रबंधन के अनुसार बदल सकती है। बाजार में अच्छी मांग और उचित भाव मिलने पर एक एकड़ से प्रतिदिन लगभग 600 से 1,500 रुपये तक की बिक्री संभव बताई जाती है। गर्मी के मौसम में हरी धनिया की मांग बढ़ने पर कई क्षेत्रों में किसानों को बेहतर भाव मिल सकता है।
बीज के लिए फसल को अधिक समय देना पड़ता है
जो किसान धनिये के बीज का उत्पादन करना चाहते हैं, उन्हें फसल को पत्तियों की तुलना में अधिक समय तक खेत में रखना पड़ता है। सामान्यतः बीज लगभग 100 से 120 दिनों में तैयार हो सकते हैं। सिंचाई की सुविधा और उचित प्रबंधन वाली खेती में प्रति एकड़ लगभग 7 से 9 क्विंटल तक बीज उत्पादन प्राप्त होने की जानकारी दी जाती है। वहीं असिंचित परिस्थितियों में यह उपज लगभग 3 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ तक रह सकती है। वास्तविक उत्पादन और बिक्री मूल्य क्षेत्र, किस्म, मौसम तथा बाजार की स्थिति पर निर्भर करता है।
धनिये की खेती के लिए सही किस्म का चुनाव जरूरी
धनिये की खेती का उद्देश्य तय करने के बाद किस्म का चयन करना चाहिए। कुछ किस्में मुख्य रूप से हरी पत्तियों के लिए उपयोग की जाती हैं, कुछ बीज उत्पादन के लिए और कुछ ऐसी होती हैं जिनसे पत्तियों तथा बीज दोनों का उत्पादन लिया जा सकता है। इसके अलावा बहु-कटाई वाली धनिया की किस्में भी किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं, क्योंकि इनसे एक ही बुवाई से कई बार हरी पत्तियों की कटाई की जा सकती है।
पत्तियों और बीजों के लिए अलग-अलग किस्में
केवल पत्तियों के लिए आरसीआर-41 और गुजरात धनिया जैसी किस्मों का उपयोग किया जाता है। बीज उत्पादन के लिए आरसीआर-20, स्वाति और साधना जैसी किस्में उपयोग में लाई जाती हैं। वहीं पूसा-360, पंत धनिया और सिंधु जैसी किस्मों से पत्तियों और बीज दोनों का उत्पादन लिया जा सकता है। ऐसी किस्मों में दो से तीन बार पत्तियों की तुड़ाई करने के बाद पौधों को बीज बनने के लिए खेत में छोड़ा जा सकता है।
बहु-कटाई वाली धनिया से बढ़ सकता है उत्पादन
बहु-कटाई वाली धनिया अपनी विशेष सुगंध, चौड़ी और चमकदार पत्तियों तथा बार-बार कटाई की क्षमता के लिए जानी जाती है। इस प्रकार की धनिया में पौधे अधिक झाड़ीदार होते हैं और डंठल अपेक्षाकृत छोटे होते हैं। इसमें फूल आने में भी सामान्यतः अधिक समय लगता है, जिससे किसान हरी पत्तियों की एक से अधिक कटाई ले सकते हैं। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित अरका ईशा तथा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सुगंध जैसी किस्मों का उल्लेख बहु-कटाई वाली धनिया के रूप में किया जाता है।
पहली कटाई लगभग 40 दिन बाद
बहु-कटाई वाली धनिया में पहली कटाई बुवाई के करीब 40 दिन बाद की जा सकती है। इसके बाद लगभग 15 दिन के अंतराल पर अगली कटाई लेने की व्यवस्था की जा सकती है। उचित परिस्थितियों में कम से कम तीन कटाइयां लेने की क्षमता बताई जाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बुवाई के लगभग 40 दिन बाद एक एकड़ से 10 से 15 क्विंटल तक पत्तियों की उपज और तीन कटाइयों के बाद लगभग 30 क्विंटल तक कुल उपज प्राप्त हो सकती है। वास्तविक उपज खेती की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
बहु-कटाई वाली धनिया की खासियतें
बहु-कटाई वाली धनिया में पत्तियों की गुणवत्ता और सुगंध को महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार इसकी पत्तियों में लगभग 82.4 प्रतिशत नमी, 17.6 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस तथा प्रति 100 ग्राम में लगभग 167.05 मिलीग्राम विटामिन सी पाया गया है। पत्तियों में सुगंधित तेल की मात्रा लगभग 0.083 प्रतिशत तक बताई गई है। सामान्य तापमान पर उचित स्थिति में इसकी सुगंध और गुणवत्ता लगभग तीन दिन तक तथा कम तापमान में करीब तीन सप्ताह तक बनाए रखने की क्षमता बताई जाती है।
बार-बार कटाई किसानों के लिए उपयोगी
बहु-कटाई वाली धनिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान एक ही खेत से कई बार पत्तियों की बिक्री कर सकते हैं। बाजार की मांग के अनुसार कटाई का समय तय करने से ताजा पत्तियों की नियमित आपूर्ति की जा सकती है। हालांकि अधिक कटाई के साथ खेत में पोषक तत्वों और सिंचाई की जरूरत भी बढ़ सकती है, इसलिए फसल की अवस्था के अनुसार प्रबंधन करना जरूरी है।
धनिये की बुवाई का सही समय
धनिये की खेती अलग-अलग परिस्थितियों में वर्ष के विभिन्न समयों में की जा सकती है। बीज उत्पादन के लिए सामान्यतः ठंड का मौसम उपयुक्त माना जाता है। वहीं सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर पत्तियों के लिए मार्च से सितंबर के बीच भी बुवाई की जा सकती है। गर्मी के मौसम में हरी धनिया की मांग और बाजार भाव कई क्षेत्रों में बढ़ सकते हैं, इसलिए किसान बाजार की स्थिति को देखते हुए बुवाई का समय निर्धारित कर सकते हैं।
अलग-अलग समय पर बुवाई से लगातार कटाई
पत्तियों के लिए धनिया उगाने वाले किसान तीन से पांच दिन के अंतराल पर अलग-अलग क्यारियों में बुवाई कर सकते हैं। इससे सभी क्यारियां एक साथ तैयार होने के बजाय अलग-अलग समय पर कटाई योग्य होती हैं। इस तरीके से किसान बाजार की जरूरत के अनुसार लगातार ताजा धनिया की आपूर्ति कर सकते हैं और रोजाना बिक्री की व्यवस्था बना सकते हैं।
भूमि की तैयारी और खाद का प्रबंधन
धनिये की खेती के लिए ऐसी भूमि अधिक उपयुक्त मानी जाती है जहां जल निकासी अच्छी हो। दोमट मिट्टी में इसकी खेती अच्छी तरह की जा सकती है। वर्षा आधारित खेती के लिए भारी काली मिट्टी का भी उपयोग किया जा सकता है। खेत में पानी रुकने से फसल को नुकसान हो सकता है, इसलिए बुवाई से पहले जल निकासी की व्यवस्था करना जरूरी है। खेत की गहरी जुताई करने के बाद प्रति एकड़ लगभग दो से तीन टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जा सकती है।
सिंचाई के अनुसार उर्वरक प्रबंधन
असिंचित खेती के लिए आधार के रूप में लगभग 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 10 किलोग्राम सल्फर और 10 किलोग्राम पोटाश का उपयोग करने की जानकारी दी गई है। वहीं सिंचित खेती में लगभग 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 10 किलोग्राम सल्फर और 10 किलोग्राम पोटाश अंतिम जुताई के समय देने की बात कही गई है। हालांकि उर्वरक की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच, किस्म और क्षेत्र की कृषि अनुशंसाओं के अनुसार तय करना अधिक उचित है।
सीधे खेत में की जाती है धनिये की बुवाई
धनिये की बुवाई सामान्यतः सीधे खेत में की जाती है। बुवाई से पहले बीजों को पानी में भिगोने की विधि अपनाई जाती है। इसके बाद अनुशंसित मात्रा के अनुसार बीज उपचार किया जा सकता है। बीज उपचार के लिए किसी भी दवा का उपयोग कृषि विशेषज्ञ या संबंधित कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार ही करना चाहिए।
बीज की गहराई और पौधों की दूरी
सिंचाई सुविधा वाली खेती में बीजों को लगभग 1 से 2.5 सेंटीमीटर की गहराई पर बोने की जानकारी दी जाती है। असिंचित परिस्थितियों में लगभग 5 से 7 सेंटीमीटर गहराई पर बुवाई करने की बात कही गई है। पंक्तियों के बीच करीब 25 से 30 सेंटीमीटर और पौधों के बीच लगभग 4 से 10 सेंटीमीटर दूरी रखी जा सकती है। मिट्टी और खेती के उद्देश्य के अनुसार दूरी में बदलाव किया जा सकता है।
खरपतवार नियंत्रण से बढ़ेगी फसल की बढ़वार
धनिये की फसल की शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खरपतवार पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। बुवाई के लगभग 25 से 35 दिन बाद खेत की निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।
हाथ से निराई-गुड़ाई भी प्रभावी तरीका
हरी पत्तियों के लिए उगाई जाने वाली धनिया में खेत की स्वच्छता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। किसान आवश्यकता के अनुसार हाथ से निराई-गुड़ाई कर सकते हैं। फसल की अवस्था और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार खरपतवार नियंत्रण की अनुशंसित विधि अपनानी चाहिए।
माहू और चूर्णिल आसिता से फसल को बचाएं
धनिये की फसल में माहू प्रमुख रस चूसक कीटों में शामिल है। यह पौधे के कोमल हिस्सों से रस चूसकर फसल की बढ़वार और पत्तियों की गुणवत्ता प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा चूर्णिल आसिता रोग भी विशेष रूप से पत्तियों के लिए उगाई गई धनिया में नुकसान पहुंचा सकता है। रोग और कीटों की समय पर पहचान करके नियंत्रण करना जरूरी है।
दवा का इस्तेमाल अनुशंसा के अनुसार करें
माहू के प्रकोप की स्थिति में कृषि विशेषज्ञ द्वारा अनुशंसित कीटनाशक का निर्धारित मात्रा और विधि के अनुसार उपयोग किया जाना चाहिए। चूर्णिल आसिता से बचाव के लिए स्वस्थ बीज, उचित बीज उपचार, खेत में पर्याप्त हवा का आवागमन और संतुलित पोषण पर ध्यान देना चाहिए। किसी भी रोगनाशी या कीटनाशक का प्रयोग बिना अनुशंसा के नहीं करना चाहिए, विशेषकर तब जब फसल हरी पत्तियों के रूप में सीधे बाजार में बेची जानी हो।
सही समय पर कटाई से मिल सकता है बेहतर बाजार भाव
पत्तियों के लिए उगाई गई धनिया में किस्म और मौसम के अनुसार लगभग 30 से 40 दिन बाद पहली कटाई शुरू हो सकती है। जब पौधे लगभग 6 से 10 इंच की ऊंचाई तक पहुंच जाएं, तब बाजार की मांग के अनुसार कटाई की जा सकती है। बहु-कटाई वाली किस्मों में पहली कटाई के बाद अंतराल देकर दोबारा कटाई की जाती है। किसान को कटाई का समय बाजार में मांग और भाव को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए।
पत्तियों, बीज और तेल से आमदनी के अवसर
उपलब्ध जानकारी के अनुसार धनिये की हरी पत्तियों का बाजार भाव लगभग 60 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम, बीजों का भाव करीब 120 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम और धनिये के तेल का मूल्य लगभग 1,200 से 1,500 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताया गया है। हालांकि ये भाव स्थायी नहीं होते और मंडी, मौसम, गुणवत्ता, मांग तथा आपूर्ति के अनुसार इनमें काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है। धनिये का उपयोग केवल मसाला उद्योग में ही नहीं, बल्कि इसके तेल का उपयोग सुगंध तथा सौंदर्य प्रसाधन से जुड़े उत्पादों में भी किया जाता है।
खेती से पहले बाजार की जानकारी जरूर लें
धनिये की खेती में किसान के लिए किस्म का सही चुनाव, बुवाई का समय, सिंचाई, पोषण, खरपतवार नियंत्रण और रोग-कीट प्रबंधन महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही बाजार की मांग और बिक्री व्यवस्था को पहले से समझना भी जरूरी है। पत्तियों के लिए अलग-अलग समय पर बुवाई करके नियमित कटाई की व्यवस्था बनाई जा सकती है, जबकि बीज के लिए फसल को पकने तक खेत में रखकर बिक्री की जा सकती है। खेती की लागत, स्थानीय उत्पादन, मंडी भाव और मौसम को ध्यान में रखकर योजना बनाने पर किसान धनिये की खेती से अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं।
ये भी पढ़ें: बिहार में सहकारिता नीति 2026 को जमीन पर उतारने की तैयारी तेज

