खेती-किसानी

गेहूं और जौ की बुवाई को लेकर आईसीएआर की नई एडवाइजरी जारी

ICAR issues new advisory for sowing of wheat and barley

नई दिल्ली: रबी सीजन 2026-27 में गेहूं और जौ की बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईआईडब्ल्यूबीआर), करनाल ने किसानों के लिए नई कृषि सलाह जारी की है। 1 से 15 नवंबर 2026 की अवधि के लिए जारी इस सलाह में किसानों को क्षेत्र के अनुसार उन्नत किस्मों का चयन करने, प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करने और समय पर बुवाई करने की सलाह दी गई है। संस्थान ने बीज दर, खाद की मात्रा और खरपतवार नियंत्रण के उपायों की जानकारी भी दी है। संस्थान के अनुसार, गेहूं की बुवाई में देरी होने से फसल के पकने के समय तापमान बढ़ सकता है। इससे दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पैदावार घटने की आशंका रहती है। इसलिए किसानों को अपने क्षेत्र के लिए निर्धारित बुवाई अवधि का ध्यान रखना चाहिए। साथ ही, दूसरे कृषि जलवायु क्षेत्र की किस्में लगाने से बचना चाहिए।

गेहूं की उन्नत किस्मों को लेकर क्षेत्रवार सलाह

आईसीएआर ने गेहूं की खेती के लिए अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार किस्मों की सिफारिश की है। किसानों को बुवाई का समय, सिंचाई की उपलब्धता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बीज का चयन करना चाहिए।

उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र

पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए सिंचित परिस्थितियों में अगेती बुवाई के तहत डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 303, डब्ल्यूएच 1270, डीबीडब्ल्यू 327, डीबीडब्ल्यू 332, पीबीडब्ल्यू 872, डीबीडब्ल्यू 370, डीबीडब्ल्यू 371 और डीबीडब्ल्यू 372 की सिफारिश की गई है। समय पर बुवाई के लिए पूसा गेहूं 3471, डीबीडब्ल्यू 222, एचडी 3406, एचडी 3386, पीबीडब्ल्यू 826, एचडी 3226, एचडी 3086 और डब्ल्यूएच 1105 जैसी किस्में सुझाई गई हैं।

मध्य और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र

मध्य क्षेत्र में मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के उदयपुर एवं कोटा संभाग शामिल हैं। यहां अगेती बुवाई के लिए डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 303, डीबीडब्ल्यू 327, डीबीडब्ल्यू 445, जे डब्ल्यू 1399, पीबीडब्ल्यू 906, एचडी 3463 और जीडब्ल्यू 543 की सिफारिश की गई है। समय पर बुवाई के लिए एचआई 1636, एचआई 1669, एमएसीएस 6768, जीडब्ल्यू 366, जीडब्ल्यू 555, एमएसीएस 6837 और एचआई 1683 सहित अन्य किस्में सुझाई गई हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के किसानों के लिए डीबीडब्ल्यू 187, पीबीडब्ल्यू 826, एचडी 3411, डीबीडब्ल्यू 222, एचडी 3086, के 1006, पीबीडब्ल्यू 915 और डीबीडब्ल्यू 386 की सिफारिश की गई है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक के लिए किस्में

प्रायद्वीपीय क्षेत्र में महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान डीबीडब्ल्यू 168, एमएसीएस 6478, यूएएस 304, एमएसीएस 6222, पीबीडब्ल्यू 891, एचआई 8849, एमएसीएस 4135, एकेएडब्ल्यू 5100, डीबीडब्ल्यू 443, एनडब्ल्यूएस 2222 और डब्ल्यूएच 1306 जैसी किस्मों का चयन कर सकते हैं।

गेहूं की बीज दर और खाद की मात्रा

संस्थान ने सिंचित परिस्थितियों में समय पर बुवाई के लिए गेहूं की बीज दर 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखने की सलाह दी है। उर्वरकों की मात्रा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग निर्धारित की गई है। उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश देने की सिफारिश की गई है। वहीं, मध्य और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देने की सलाह है। नाइट्रोजन की एक-तिहाई मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा को दो बराबर हिस्सों में बांटकर पहली और दूसरी सिंचाई के समय देना चाहिए।

गेहूं में खरपतवार नियंत्रण के उपाय

गेहूं की फसल में गुल्ली डंडा सहित अन्य खरपतवार पैदावार को प्रभावित कर सकते हैं। इनके नियंत्रण के लिए संस्थान ने बुवाई के शून्य से तीन दिन के भीतर खरपतवारनाशी के इस्तेमाल की सलाह दी है। इसके लिए पायरोक्सासल्फोन 85 डब्ल्यूजी की 60 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ अकेले या पेंडीमेथालिन 30 ईसी की 2 लीटर मात्रा के साथ इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा एक्लोनिफेन, डाइफ्लुफेनिकन और पायरोक्सासल्फोन के तैयार मिश्रण मेटेनो मोर की 800 मिली मात्रा प्रति एकड़ इस्तेमाल की जा सकती है। इनका छिड़काव 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। छिड़काव के समय मौसम साफ होना जरूरी है। बारिश, कोहरा या ओस की स्थिति में छिड़काव से बचना चाहिए।

जौ की बुवाई के लिए भी किस्मों की सिफारिश

गेहूं के साथ-साथ संस्थान ने जौ की खेती के लिए भी क्षेत्रवार किस्मों और बुवाई की अवधि की जानकारी दी है। किसानों को बाजार की मांग और अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार चारा, छिलका रहित और माल्ट जौ की किस्मों का चयन करना चाहिए।

उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र

पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों में 10 से 25 नवंबर के बीच जौ की बुवाई करने की सलाह दी गई है। यहां चारा जौ के लिए डी डब्ल्यू आर बी 137 और बी एच 946, छिलका रहित जौ के लिए पी एल 891 और डी डब्ल्यू आर बी 223 तथा दोहरे उपयोग वाली किस्मों के लिए आर डी 2715 और आर डी 2552 की सिफारिश की गई है। माल्ट जौ के लिए डी डब्ल्यू आर बी 219, डी डब्ल्यू आर यू बी 52, आर डी 2849, डी डब्ल्यू आर बी 123, डी डब्ल्यू आर बी 101 और डी डब्ल्यू आर बी 182 सुझाई गई हैं।

उत्तर-पूर्वी और मध्य क्षेत्र

उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र में सिंचित परिस्थितियों के तहत चारा जौ के लिए डी डब्ल्यू आर बी 137 और एच यू बी 113, छिलका रहित जौ के लिए के 1149 और एन डी बी 943 तथा दोहरे उपयोग के लिए आर डी 2715 और आर डी 2552 की सिफारिश की गई है। यहां सिंचित फसल की बुवाई 10 से 25 नवंबर के बीच की जा सकती है। बारानी परिस्थितियों में 20 अक्टूबर से 10 नवंबर तक के 603 और लखन किस्मों की बुवाई की सलाह दी गई है। मध्य क्षेत्र में चारा जौ के लिए डी डब्ल्यू आर बी 137 और आर डी 2899, छिलका रहित जौ के लिए पी एल 891 और डी डब्ल्यू आर बी 223 तथा दोहरे उपयोग के लिए आर डी 2715 और आर डी 2552 सुझाई गई हैं।

लवणीय मिट्टी और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए जौ

लवणीय और क्षारीय मिट्टी में 10 से 25 नवंबर के बीच चारा जौ की खेती के लिए एन डी बी 1173, आर डी 2794 और आर डी 2907 की सिफारिश की गई है। उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में बारानी परिस्थितियों के तहत 15 अक्टूबर से 10 नवंबर तक बी एच एस 400, एच बी एल 113 और वी एल बी 118 की बुवाई की जा सकती है। छिलका रहित जौ के लिए बी एच एस 352 और बी एच एस 497 तथा दोहरे उपयोग के लिए बी एच एस 380 की सिफारिश की गई है।

जौ की बीज दर, खाद और बीज उपचार

जौ की खेती के लिए 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर रखने की सलाह दी गई है। चारा और छिलका रहित जौ के लिए प्रति हेक्टेयर 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश देने की सिफारिश है। उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में माल्ट जौ के लिए 90 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देने की सलाह दी गई है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई आधी मात्रा पहली सिंचाई के समय देने की सलाह है। संस्थान ने जौ को दीमक और कंडुआ जैसे रोगों से बचाने के लिए बीज उपचार पर भी जोर दिया है। हालांकि, बीज उपचार में किसी भी रसायन का इस्तेमाल करने से पहले किसानों को उसकी वर्तमान स्वीकृति, फसल पर उपयोग की अनुमति और उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों की जांच करनी चाहिए। जैविक उपचार के लिए एजोटोबैक्टर और पीएसबी जैसे उपयोगी सूक्ष्मजीवों के इस्तेमाल की भी सलाह दी गई है।

फसल अवशेष न जलाएं, मिट्टी की सेहत का रखें ध्यान

संस्थान ने गेहूं और जौ की खेती करने वाले किसानों को बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराने की सलाह दी है। खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए। धान की कंबाइन से कटाई वाले खेतों में यदि फसल अवशेष समान रूप से फैले हुए हैं, तो हैप्पी सीडर या स्मार्ट सीडर की मदद से बिना अवशेष हटाए सीधी बुवाई की जा सकती है। किसानों को समय पर सिंचाई करने, संतुलित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल करने और फसल अवशेष नहीं जलाने की सलाह दी गई है। संस्थान के अनुसार, क्षेत्र के अनुकूल किस्मों का चयन, समय पर बुवाई और संतुलित कृषि प्रबंधन अपनाकर किसान रबी सीजन में गेहूं और जौ की बेहतर पैदावार हासिल कर सकते हैं।

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