नई दिल्ली: देश में फसल विविधीकरण को लेकर किसानों पर अक्सर जड़ता के आरोप लगाए जाते रहे हैं, लेकिन मक्का का मौजूदा संकट इस बहस को बिल्कुल उलटी दिशा में ले जाता दिख रहा है। धान-गेहूं के चक्र से निकलकर जब किसानों ने सरकार और उद्योग की अपील पर मक्के की खेती बढ़ाई, तो आज वही मक्का किसान बाजार और नीति दोनों के बीच फंसा नजर आ रहा है। इथेनॉल और पोल्ट्री फीड के नाम पर मक्का किसानों को बेहतर दाम का सपना दिखाया गया, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले करीब एक साल से मक्का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से काफी नीचे बिक रहा है।
फसल बदली, लेकिन बाजार ने साथ नहीं दिया
मक्के को पर्यावरण के लिहाज से बेहतर फसल माना जाता है क्योंकि इसकी पानी की जरूरत धान-गेहूं की तुलना में काफी कम होती है। इसी आधार पर किसानों से मक्के की खेती बढ़ाने की अपील की गई। बीते पांच वर्षों में देश में मक्के का रकबा करीब 22 लाख हेक्टेयर और उत्पादन लगभग 118 लाख मीट्रिक टन बढ़ गया। किसानों ने सरकार की नीति पर भरोसा करते हुए अपनी खेती का स्वरूप बदला, लेकिन अब बाजार में उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
MSP से हजार रुपये नीचे बिक रहा मक्का
इस समय मक्के का MSP 2400 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि जनवरी 2026 के दौरान देश में इसका औसत बाजार भाव 1663.23 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया। कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में स्थिति और भी खराब है। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की रेहटी मंडी में मक्का 1486.40 रुपये, शिवपुरी की खटोरा मंडी में 1487.73 रुपये और विदिशा में 1496.35 रुपये प्रति क्विंटल तक बिका। सरकार खुद मानती है कि एक क्विंटल मक्का पैदा करने की लागत करीब 1508 रुपये है। ऐसे में कई मंडियों में किसान लागत से भी कम दाम पर मक्का बेचने को मजबूर हैं।
लागत भी नहीं निकल पा रही
मक्का का MSP इस समय A2+FL फार्मूले के आधार पर तय किया गया है, जबकि किसान लंबे समय से C2 (कम्प्रिहेंसिव कॉस्ट) फार्मूले की मांग कर रहे हैं, जिसकी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग भी कर चुका है। C2 फार्मूले के मुताबिक एक क्विंटल मक्का उगाने की लागत लगभग 1952 रुपये आती है। इस पर 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़ने पर MSP करीब 2928 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। मौजूदा बाजार भाव इस स्तर से करीब 1200 रुपये तक नीचे है, जिससे किसानों को सीधा घाटा उठाना पड़ रहा है।
इथेनॉल नीति बनी कीमत गिरने की वजह
मक्का की कीमत गिरने के पीछे इथेनॉल नीति में हुए बदलाव को अहम वजह माना जा रहा है। कमोडिटी विशेषज्ञ संतोष शर्मा के अनुसार, सितंबर 2025 में लागू नए नियम के तहत यदि कोई इथेनॉल प्लांट सालाना एक लाख टन अनाज की खपत करता है, तो उसमें 60 हजार टन मक्का और 40 हजार टन चावल मिलाना अनिवार्य कर दिया गया है। इस नीति से इथेनॉल कंपनियों को चावल की ओर झुकाव बढ़ाने का मौका मिला। एफसीआई का चावल 2320 रुपये प्रति क्विंटल की दर से उपलब्ध है और उससे बने इथेनॉल की कीमत 60.32 रुपये प्रति लीटर है, जबकि मक्के से बने इथेनॉल की कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर तय है। चावल से बने इथेनॉल की कीमत कम होने से कंपनियां मक्के की खरीद घटा रही हैं, जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है।
सवालों के घेरे में नीति और वादे
किसान पूछ रहे हैं कि जब उद्योगपतियों के लिए इथेनॉल की कीमत तय और सुरक्षित है, तो मक्के के लिए MSP पर खरीद की गारंटी क्यों नहीं दी जा सकती। जिस फसल को बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया गया, वही आज घाटे का सौदा बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में मक्के का रकबा घट सकता है, जिससे फसल विविधीकरण और इथेनॉल नीति दोनों के लक्ष्य प्रभावित होंगे। फिलहाल मक्का किसान यही सवाल कर रहे हैं कि बदलाव की कीमत उन्हें ही क्यों चुकानी पड़ रही है।
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