नई दिल्ली: भारत में चालू वित्तीय वर्ष के दौरान दालों के आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक इस साल दालों का आयात पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत कम रह सकता है। आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में दालों का आयात लगभग 5 मिलियन टन रहने की संभावना है, जबकि बीते साल भारत ने करीब 7.3 मिलियन टन दालों का आयात किया था। कई जानकार इसे घरेलू कृषि और बाजार संतुलन के लिहाज से सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।
क्यों घट सकता है दालों का आयात
विशेषज्ञों के अनुसार आयात में संभावित गिरावट की प्रमुख वजहें अधिक कैरी फॉरवर्ड स्टॉक, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और पीली मटर पर आयात शुल्क लगाया जाना है। इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के चेयरमैन बिमल कोठारी के मुताबिक पिछले वर्ष आयातित दालों का बड़ा स्टॉक इस साल भी उपलब्ध है, जिससे नए आयात की जरूरत कम हो गई है।
सरकारी आंकड़े भी कर रहे पुष्टि
वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी ताजा क्विक एस्टिमेट्स भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं। आंकड़ों के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में अप्रैल से दिसंबर के बीच दालों का आयात मूल्य के लिहाज से 33.33 प्रतिशत घटकर 2.525 अरब डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 3.788 अरब डॉलर था।
सस्ते आयात पर रोक की मांग
पिछले वर्ष जुलाई में किसानों और व्यापारियों के संगठनों ने केंद्र सरकार से सस्ते दाल आयात पर रोक लगाने की अपील की थी। उनका तर्क था कि कम कीमत पर होने वाला आयात घरेलू बाजार को प्रभावित करता है, जिससे किसानों को उचित दाम नहीं मिल पाते। साथ ही आयात पर नियंत्रण से किसानों को दालों का रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
भारत के लिए दालों का महत्व
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक देश है, इसके बावजूद बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है। दालें एक ओर जहां उपभोक्ताओं के लिए सस्ते प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों किसानों की आय का आधार भी हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में दालें भारत के लिए एक संवेदनशील विषय रही हैं।
आयात शुल्क और बीते वर्षों का ट्रेंड
हाल ही में केंद्र सरकार ने पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का फैसला किया, जिसे व्यापक समर्थन मिला। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दालों का आयात वर्ष 2022-23 में करीब 25 लाख टन था, जो 2023-24 में बढ़कर 47 लाख टन से अधिक हो गया। 2024-25 (अप्रैल-मार्च) में यह और बढ़कर 72 लाख टन से ज्यादा पहुंच गया, जिसकी कीमत 5 अरब डॉलर से अधिक रही। माना जा रहा है कि नए नीतिगत कदमों और बेहतर घरेलू उपलब्धता से आने वाले समय में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
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