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उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ेगा सरकार का खर्च, किसानों पर होगा ये असर

fertilizer subsidy 2026-27

नई दिल्ली: भारत में खेती की रीढ़ माने जाने वाले उर्वरक क्षेत्र पर सरकार का भारी खर्च आने वाले वर्षों में भी जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) के आकलन के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार का कुल उर्वरक सब्सिडी खर्च करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यह अनुमान ऐसे समय में आया है, जब खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बनी हुई है और सरकार किसानों को वाजिब दाम पर खाद उपलब्ध कराने के लिए लगातार सब्सिडी दे रही है।

उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ेगा सरकारी बोझ

ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च आने वाले वर्षों में ऊंचा बना रह सकता है। बढ़ती वैश्विक कीमतों, घरेलू मांग और किसानों को राहत देने की नीति के चलते सरकार को बड़े बजट आवंटन की जरूरत पड़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सब्सिडी ढांचा घरेलू उर्वरक उत्पादकों के लिए अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।

आयात पर निर्भर कंपनियों की मुश्किलें बरकरार

रिपोर्ट में बताया गया है कि उर्वरक सब्सिडी का लाभ जहां घरेलू निर्माताओं को मिलने की संभावना है, वहीं आयात पर निर्भर कंपनियों की चुनौतियां कम नहीं होंगी। खासकर डीएपी जैसे उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। इसके चलते आयात लागत और घरेलू बिक्री मूल्य के बीच का अंतर बढ़ रहा है, जिससे आयातकों के मुनाफे पर दबाव बना हुआ है।

घरेलू उर्वरक उत्पादकों को राहत की उम्मीद

इक्रा के मुताबिक, रबी सीजन 2025-26 के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) दरों में की गई बढ़ोतरी से घरेलू एनपीके उर्वरक उत्पादकों को राहत मिल सकती है। इससे गैर-यूरिया उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी और किसानों को विकल्प मिलते रहेंगे। हालांकि, मौजूदा एनबीएस ढांचा डीएपी आयात की लागत को पूरी तरह संतुलित करने में अभी भी कमजोर साबित हो रहा है।

बजट प्रावधान कम पड़ने का खतरा

ICRA की रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पी एंड के (फॉस्फेट और पोटाश) उर्वरकों के लिए बजट में किया गया प्रावधान मौजूदा वैश्विक कीमतों और घरेलू मांग को देखते हुए अपर्याप्त साबित हो सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार को वर्ष के दौरान अतिरिक्त या अनुपूरक सब्सिडी आवंटन करना पड़ सकता है, ताकि किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और उर्वरक आपूर्ति बाधित न हो।

यूरिया नीति में हो सकते हैं अहम बदलाव

ICRA के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट और सेक्टर हेड वरुण गोगिया के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के अंत तक सरकार यूरिया इकाइयों के लिए ऊर्जा मानकों और रिटेंशन प्राइसिंग मैकेनिज्म के तहत मिलने वाले फिक्स्ड कॉस्ट में संशोधन कर सकती है। इस तरह के बदलाव आगे चलकर यूरिया कंपनियों की लाभप्रदता और निवेश निर्णयों पर असर डाल सकते हैं।

खाद की मांग में सीमित लेकिन स्थिर बढ़ोतरी

रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक बिक्री में सालाना आधार पर 1 से 3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह वृद्धि दीर्घकालिक औसत के अनुरूप मानी जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि कृषि क्षेत्र में उर्वरकों की मांग स्थिर बनी रहेगी और सरकार की सब्सिडी नीति किसानों और उद्योग दोनों के लिए अहम भूमिका निभाती रहेगी।

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