नई दिल्ली: पिछले दो वर्षों में लहसुन की खेती किसानों के लिए सोने का सौदा साबित हुई थी। बाजार में शानदार दाम मिलने से किसानों ने लाखों की कमाई की और लहसुन को नकदी फसल के रूप में अपनाया। लेकिन इस साल हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। इस बार लहसुन के रेट 100 रुपये किलो से गिरकर 30 से 40 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जिससे किसानों में मायूसी फैल गई है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि लहसुन की खेती में लागत निकलने की चिंता नहीं है। किसान अपनी पुरानी उपज से ही बीज निकाल लेते हैं, जिससे अगली फसल की लागत घट जाती है। लेकिन जो उम्मीदें पिछले दो वर्षों की कमाई ने जगाई थीं, वे इस बार पूरी होती नहीं दिख रहीं।
लहसुन की कीमतों में गिरावट के पीछे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही कारण हैं। भारत का लहसुन विदेशों में अच्छी मांग रखता है, लेकिन वहां भी कीमतें 30 से 90 रुपये प्रति किलो के बीच सीमित हैं। यही ट्रेंड घरेलू बाजार में भी देखने को मिल रहा है। जब दोनों बाजारों में भाव लगभग बराबर होते हैं, तो किसानों को निर्यात से मिलने वाला अतिरिक्त लाभ नहीं मिल पाता। विशेषज्ञ बताते हैं कि किसानों ने अच्छी क्वालिटी का लहसुन बीज के लिए रोक लिया है और बाजार में कम गुणवत्ता वाला माल भेज रहे हैं। इससे बाजार में दोयम दर्जे की लहसुन की भरमार हो गई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अच्छी क्वालिटी की उपज बाजार में नहीं आएगी, तब तक कीमतों में सुधार संभव नहीं है।
भविष्य में लहसुन के भावों में कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा। विशेषज्ञ कहते हैं कि वर्तमान ट्रेंड के अनुसार भाव 10-20 रुपये प्रति किलो तक ऊपर जा सकते हैं, लेकिन इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं है। अगर आने वाले दिनों में विदेशी लहसुन का आयात बढ़ा, तो स्थानीय किसानों को और अधिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। भारत को चीनी लहसुन के आयात से बचाने के लिए विशेषज्ञ जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हैं। इन दोनों राज्यों ने बड़े आकार के लहसुन की खेती में नया रिकॉर्ड बनाया है। यहां उत्पादित लहसुन चीन की तरह ही बड़ा और आकर्षक होता है। इस बार इन राज्यों के किसानों को 80-90 रुपये प्रति किलो तक दाम मिले हैं, जबकि पहले केवल 25-30 रुपये मिलते थे।
अगर इन राज्यों को सरकार की ओर से तकनीकी और विपणन सहयोग मिले, तो भारत खुद ही उच्च गुणवत्ता वाला लहसुन तैयार कर सकता है और विदेशी निर्भरता से मुक्त हो सकता है। फिलहाल लहसुन के बाजार में सुधार की उम्मीद कम है। किसानों को फिलहाल धैर्य रखना होगा और सरकार को चाहिए कि वह लहसुन उत्पादक राज्यों को सपोर्ट दे ताकि देश में उच्च गुणवत्ता वाले लहसुन का उत्पादन बढ़ सके और किसानों को उनके पसीने की सही कीमत मिल सके।
