लखनऊ: देश के कई राज्यों की मंडियों में आलू के गिरते भाव का मुद्दा अब राजनीतिक मुद्दा बनते जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आलू की कीमतों में आई भारी गिरावट को लेकर केंद्र और राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति लापरवाह बनी हुई है और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है।
किसानों की समस्या पर सरकार गंभीर नहीं: अखिलेश यादव
अखिलेश यादव ने कहा कि आलू के दाम लगातार गिरने से किसान आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी परेशानियों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकता किसानों की समस्याओं का समाधान करना नहीं बल्कि राजनीतिक सत्ता को बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के नेता चुनाव प्रचार के समय तो सक्रिय रहते हैं, लेकिन जब किसानों की समस्याओं के समाधान की बात आती है तो वे पीछे हट जाते हैं। उनके अनुसार सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि फसलों के दाम इतने कम हो जाते हैं कि किसानों की लागत भी पूरी नहीं हो पाती।
सपा प्रमुख ने चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति बनी रही तो किसान खेती छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं और कई किसान अपनी जमीन बेचने की स्थिति में पहुंच सकते हैं। उन्होंने कहा कि हालात ऐसे बन सकते हैं कि किसान अपने ही खेत की पैदावार बाजार से खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं।
पांच महीनों से लगातार गिर रहे आलू के दाम
आलू की कीमतों से जुड़े सरकारी आंकड़े भी किसानों की चिंता बढ़ा रहे हैं। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत संचालित राष्ट्रीय कृषि बाजार सूचना नेटवर्क के आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच देश में आलू की औसत थोक कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 में आलू का औसत थोक भाव लगभग 1879 रुपये प्रति क्विंटल था। दिसंबर में यह घटकर करीब 1584 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। इसके बाद जनवरी 2026 में औसत कीमत करीब 1421 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज की गई। फरवरी 2026 में आलू का औसत भाव और गिरकर लगभग 1266 रुपये प्रति क्विंटल रह गया, जबकि मार्च 2026 में यह घटकर करीब 1185 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। इस तरह पांच महीनों में औसत कीमत करीब 694 रुपये प्रति क्विंटल घट गई, जो लगभग 37 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाती है।
प्रमुख उत्पादक राज्यों में भी दाम गिरे
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो कई प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में भी कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिली है। मध्य प्रदेश में नवंबर 2025 में आलू का भाव लगभग 2203 रुपये प्रति क्विंटल था, जो मार्च 2026 में घटकर करीब 460 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया।
उत्तर प्रदेश में इसी अवधि के दौरान आलू की कीमत लगभग 1224 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर करीब 602 रुपये प्रति क्विंटल रह गई। बिहार में भी नवंबर के लगभग 1612 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले मार्च में कीमत लगभग 956 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज की गई।
पंजाब, हरियाणा, गुजरात और पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों की मंडियों में भी इसी तरह कीमतों में गिरावट देखी गई है। हालांकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में आलू की कीमतें अपेक्षाकृत ऊंची बनी हुई हैं।
दक्षिण भारत में ऊंचे बने हुए हैं भाव
दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में आलू का स्थानीय उत्पादन कम होने के कारण बाजार दूसरे राज्यों से आने वाली आपूर्ति पर निर्भर रहता है। इसी वजह से वहां कीमतें ज्यादा बनी रहती हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 में केरल में आलू का औसत भाव लगभग 3979 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जबकि तमिलनाडु में यह करीब 3066 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास दर्ज किया गया।
नई फसल की आवक से दबाव में बाजार
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आलू की कीमतों में गिरावट की मुख्य वजह नई फसल की बढ़ती आवक और मंडियों में आपूर्ति का बढ़ना है। फरवरी और मार्च के दौरान उत्तर भारत की मंडियों में आलू की बड़ी मात्रा में आवक होती है, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है। इस वर्ष आलू के उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान भी लगाया जा रहा है, जिससे बाजार में भाव पिछले वर्ष की तुलना में कमजोर बने हुए हैं।
किसान संगठनों की न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग
लगातार गिरते दामों के बीच कई किसान संगठन आलू पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर दे तो किसानों को कम से कम उनकी लागत के बराबर कीमत मिल सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आलू के निर्यात को बढ़ाने, भंडारण क्षमता को मजबूत करने और प्रसंस्करण उद्योग का विस्तार करने से ही बाजार में संतुलन बनाया जा सकता है और किसानों को बेहतर कीमत मिल सकती है।
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