मंडी भाव

दाल की गिरती कीमतों से किसान परेशान

नई दिल्ली:  एक ओर केंद्र सरकार राष्ट्रीय मिशनों और योजनाओं के ज़रिए देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अरहर, चना, मूंग और उड़द जैसी प्रमुख दालों की कीमतें मंडियों में लगातार गिरती जा रही हैं। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इनमें भी सबसे खराब स्थिति अरहर यानी तुअर की है, जिसकी कीमतें एक साल में करीब 43 प्रतिशत तक लुढ़क गई हैं। सरकारी एगमार्कनेट पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 27 जून 2024 को अरहर की औसत कीमत 11,213 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो इस साल 27 जून 2025 को घटकर मात्र 6,422 रुपये रह गई। यानि किसानों को लगभग 4,800 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान हुआ है। स्थिति यह है कि 12 जुलाई को भी महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की कई प्रमुख मंडियों में अरहर की कीमतें सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे ही बनी रहीं। पूरे देश में केवल तेलंगाना की आलेर मंडी ऐसी रही जहां तुअर 7,550 रुपये प्रति क्विंटल के MSP पर बिकी।

खरीफ विपणन वर्ष 2024-25 में अरहर का MSP 7,550 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे अब बढ़ाकर 8,000 रुपये कर दिया गया है। हालांकि, सवाल यही है कि जब मौजूदा सीजन में ही किसानों को MSP से कम दाम मिल रहे हैं, तो अगली फसल के लिए घोषित इस बढ़े हुए समर्थन मूल्य का उन्हें क्या लाभ मिलेगा? यह स्थिति किसानों के मन में गहरी चिंता पैदा कर रही है। सरकारी खरीद नीति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। प्राइस सपोर्ट स्कीम (PSS) के तहत सरकार दालों की खरीद तो करती है, लेकिन यह खरीद केवल कुल उत्पादन के सीमित हिस्से तक ही सीमित रहती है। इसमें भी गुणवत्ता, नमी और अन्य शर्तों के आधार पर किसानों को पूरा MSP नहीं मिल पाता। अरहर की खरीद तो और भी पीछे है, जिससे किसान खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

दलहन बाजार में अस्थिरता की एक और बड़ी वजह भारत की आयात नीति है। देश में दालों की मांग को पूरा करने और खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार विदेशों से बड़ी मात्रा में दालों का आयात करती है। कई बार यह आयात कम शुल्क या शून्य शुल्क पर किया जाता है, जिससे घरेलू उत्पादकों को सीधा नुकसान होता है। पीली मटर जैसी सस्ती दालों के आयात से अरहर और चना जैसी महंगी दालों की मांग पर असर पड़ता है, और अंततः इनकी कीमतें गिरती हैं। इससे किसान अपनी फसल की लागत भी नहीं निकाल पाते।

बाजार की गिरती कीमतों और कमजोर सरकारी खरीद व्यवस्था के बीच सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस साल खरीफ सीजन में अरहर की बुवाई भी पिछड़ गई है। कृषि मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार, जून के अंत तक जहां बाकी दलहन फसलों की बुवाई में तेजी आई है, वहीं अरहर पिछली बार की तुलना में कम बोई गई है। यह संकेत देता है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले समय में अरहर का उत्पादन घट सकता है, और देश की आत्मनिर्भरता की योजना पर सवाल खड़े हो सकते हैं। ऐसे हालात में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि MSP सिर्फ घोषणा भर न रह जाए, बल्कि किसानों को उसकी वास्तविक प्राप्ति हो। साथ ही, दलहन आयात नीति में भी संतुलन लाने की जरूरत है, ताकि घरेलू किसानों को उनका हक मिल सके। यदि इन बिंदुओं पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आत्मनिर्भर भारत का सपना सिर्फ कागजों तक सिमट जाएगा और देश के अन्नदाता खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

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