नई दिल्ली: भारत में चावल दो-तिहाई आबादी का मुख्य आहार है और हर व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 220 ग्राम चावल का सेवन करता है। यह ऊर्जा और कार्बोहाइड्रेट का एक समृद्ध स्रोत है, लेकिन पोषण की दृष्टि से यह धीरे-धीरे कमजोर होता गया है। चावल के मिलिंग और पॉलिशिंग की प्रक्रिया के दौरान इसमें मौजूद आयरन, जिंक और विटामिन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि देश में विटामिन ए, आयरन और आयोडीन की भारी कमी देखने को मिलती है, जिसे ‘हिडन हंगर’ यानी ‘छिपी हुई भूख’ कहा जाता है। विशेषकर गरीब और सीमित आहार संसाधनों वाले तबके के लिए यह समस्या और गंभीर है। उनके भोजन में विविधता की कमी होती है और वे ज्यादातर केवल चावल पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में बायोफोर्टिफाइड चावल – यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध किस्में पोषण सुरक्षा की दिशा में एक बड़ी राहत साबित हो सकती हैं।
चावल में स्वाभाविक रूप से प्रोटीन की मात्रा अन्य अनाजों जैसे गेहूं, बाजरा और जौ की तुलना में कम होती है। जहां गेहूं में प्रोटीन की मात्रा 10-12 प्रतिशत होती है, वहीं चावल में यह केवल 6.8 प्रतिशत तक सीमित रह जाती है। यही कारण है कि चावल-प्रधान क्षेत्रों में विशेषकर बच्चों में प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण की समस्या ज्यादा देखी जाती है। शोध बताते हैं कि 1960 के दशक में भारतीय चावल में प्रति किलोग्राम जिंक की मात्रा 27.1 मिलीग्राम और आयरन 59.8 मिलीग्राम थी, जो 2000 तक घटकर क्रमशः 20.6 और 43.1 मिलीग्राम रह गई। यही गिरावट गेहूं की किस्मों में भी देखी गई है।
आयरन की शरीर में भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि यह हीमोग्लोबिन का एक अनिवार्य घटक होता है जो शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन पहुंचाता है। जब इसकी कमी होती है, तो थकान, कमजोरी और एनीमिया जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। देश में नवजात मृत्यु दर 24.9 प्रति हजार जन्म है, जबकि शिशु मृत्यु दर 35.2 है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 35.5% बच्चे स्टंटिंग यानी कम ऊंचाई, 19.3% वेस्टिंग और 7.7% गंभीर वेस्टिंग से ग्रस्त हैं। 67.1% बच्चे एनीमिक हैं, वहीं 15-49 आयु वर्ग की 57% महिलाएं भी एनीमिया से पीड़ित हैं। इसके अलावा, 24% महिलाएं और 22.9% पुरुष मोटापे की चपेट में हैं, जो पोषण के असंतुलन का स्पष्ट संकेत है।
ऐसे में समाधान स्पष्ट है, भोजन में पोषक तत्वों से भरपूर किस्मों को शामिल किया जाए। बायोफोर्टिफाइड चावल इसी दिशा में एक प्रभावी पहल है। बायोफोर्टिफिकेशन का अर्थ है – अनाज की किस्मों में अनुवांशिक सुधार द्वारा सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाना। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में इस बात पर बल दिया कि केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पोषणवर्धित उत्पादन ही अब समय की मांग है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की अगुवाई में विभिन्न कृषि संस्थानों ने बायोफोर्टिफाइड किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों में न सिर्फ जिंक और आयरन की अधिकता है, बल्कि उनमें प्रोटीन और जरूरी अमीनो अम्ल की मात्रा भी बढ़ाई गई है।
प्रमुख बायोफोर्टिफाइड चावल किस्मों की बात करें, तो छत्तीसगढ़ जिंक राइस-1 और 2, डीआरआर धन-45, 48, 49, 63, सुरभि, जिन्को राइस एमएस और सीआर धन-315 जैसी किस्मों में जिंक की मात्रा 24 पीपीएम से अधिक है। वहीं प्रोटीन युक्त किस्मों में सीआर धन-310 (भारत की पहली उच्च प्रोटीन किस्म), सीआर धन-311 (मुकुल), सीआर धन-411 (स्वर्णांजलि) और सीआर धन-324 (अभया पौष्टिक) प्रमुख हैं। ये किस्में 10-11% तक प्रोटीन और 20-23 पीपीएम जिंक प्रदान करती हैं।
इन किस्मों में ग्लूटेलिन प्रोटीन और लाइसीन जैसे आवश्यक अमीनो अम्लों की अधिकता उन्हें और भी प्रभावी बनाती है। न सिर्फ पोषण सुरक्षा बल्कि किसान की आय, उत्पादकता और चावल की खेती की स्थिरता के लिए भी ये किस्में लाभदायक सिद्ध हो सकती हैं। बायोफोर्टिफाइड चावल एक ऐसा समाधान है, जो गरीब, दूरस्थ और पोषण से वंचित आबादी तक पोषण पहुंचाने का टिकाऊ और सशक्त माध्यम बन सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि इन किस्मों का उत्पादन बढ़े, किसानों को इसके लाभों के बारे में बताया जाए और उपभोक्ताओं में भी जागरूकता लाई जाए। भारत जैसे चावल-प्रधान देश में यह एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हो सकती है, जो न केवल भूख बल्कि छिपी हुई भूख के खिलाफ भी निर्णायक शस्त्र साबित होगा।
