चंडीगढ़: हरियाणा में गन्ने की खेती में नई तकनीकों को अपनाने की अपील की गई है। सहकारिता मंत्री डॉ. अरविंद कुमार शर्मा ने किसानों से कहा कि आधुनिक तकनीकों के उपयोग से खेती की लागत कम होगी और किसानों की आमदनी में वृद्धि होगी। साथ ही गन्ने की आपूर्ति और चीनी मिलों के संचालन को बेहतर बनाने के लिए प्रदेश की सभी सहकारी चीनी मिलों में टोकन व्यवस्था लागू की गई है, जिससे किसानों को काफी सुविधा मिल रही है। डॉ. शर्मा ने यह जानकारी हरियाणा विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जवाब देते हुए दी।
नई तकनीक से खेती पर बढ़ेगी सहायता राशि
सहकारिता मंत्री ने बताया कि गन्ना प्रौद्योगिकी मिशन योजना के तहत किसानों को नई तकनीक से गन्ना लगाने के लिए अभी तीन हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता दी जा रही है। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस सहायता को बढ़ाकर पांच हजार रुपये प्रति एकड़ करने का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा किसानों को रोगमुक्त और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के लिए भी प्रति एकड़ पांच हजार रुपये का अनुदान दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि गन्ने की नई किस्मों जैसे सीओ-15023 के बीज की खरीद या उत्पादन करने वाले किसानों को भी यह सहायता मिलेगी। आगामी बजट में ऊतक संवर्धन तकनीक से गन्ना लगाने वाले किसानों को निःशुल्क पौधे उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसके साथ ही सहकारी चीनी मिलों के माध्यम से किसानों को गन्ना काटने वाले यंत्र उपलब्ध कराने की योजना है, जिससे कटाई की लागत कम होगी और किसानों को अधिक लाभ मिल सकेगा।
टोकन व्यवस्था से किसानों का समय बचा
मंत्री ने बताया कि टोकन व्यवस्था लागू होने के बाद गन्ना किसानों को घर बैठे ही टोकन लगाने की सुविधा मिल रही है। इससे चीनी मिलों में गन्ने की आपूर्ति आवश्यकता के अनुसार नियमित रूप से बनी रहती है। इस व्यवस्था का बड़ा लाभ यह है कि किसानों को गन्ना पहुंचाने में प्रति ट्रॉली लगभग दस से बारह घंटे तक की बचत हो रही है।
घट रहा गन्ने का क्षेत्रफल और पैदावार
डॉ. शर्मा ने कहा कि गन्ना हरियाणा की प्रमुख नगदी फसलों में शामिल है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके क्षेत्रफल और औसत पैदावार में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2020-21 में राज्य में गन्ने का क्षेत्रफल दो लाख छियालीस हजार तीन सौ सत्तावन एकड़ था। इसके बाद वर्ष 2021-22 में यह बढ़कर दो लाख तिरसठ हजार चार सौ निन्यानवे एकड़ और वर्ष 2022-23 में दो लाख छियासठ हजार एक सौ बयालीस एकड़ तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद लगातार गिरावट देखी जा रही है।
औसत पैदावार के आंकड़ों पर भी चिंता जताई गई है। वर्ष 2020-21 में गन्ने की औसत पैदावार 347.68 क्विंटल प्रति एकड़ थी, जबकि वर्ष 2025-26 में इसके घटकर 329.59 क्विंटल प्रति एकड़ रहने का अनुमान है। यह लगभग 5.2 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है। इसी कारण कुल उत्पादन पर भी असर पड़ा है और अनुमान है कि वर्ष 2025-26 में गन्ने का कुल उत्पादन लगभग 536.24 लाख क्विंटल रहेगा।
चीनी मिलों को नहीं मिल रहा पर्याप्त गन्ना
उन्होंने बताया कि गन्ने के क्षेत्रफल में कमी आने से चीनी मिलों को पेराई के लिए पर्याप्त गन्ना नहीं मिल पा रहा है। इस वर्ष मिलों को लगभग 509.47 लाख क्विंटल गन्ना मिलने का अनुमान है। इसके कारण चीनी मिलों के संचालन की अवधि भी सीमित रह सकती है और लगभग 108 कार्यदिवस ही मिलों के चलने की संभावना जताई गई है।
मजदूरों की कमी और मौसम बदलाव भी कारण
सहकारिता मंत्री ने बताया कि गन्ने की खेती में मजदूरों की जरूरत अधिक होती है। बुवाई से लेकर कटाई तक बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन समय पर मजदूर उपलब्ध न होना और मजदूरी दरों में बढ़ोतरी के कारण कई किसान गन्ने की जगह अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसके अलावा कटाई के लिए पर्याप्त कृषि यंत्रों की कमी भी एक बड़ी समस्या रही है।
उन्होंने कहा कि मौसम में हो रहे बदलाव का भी गन्ने की पैदावार पर असर पड़ रहा है। हरियाणा में सामान्य रूप से मानसून जुलाई के पहले सप्ताह से सक्रिय होता है, लेकिन हाल के वर्षों में अप्रैल से ही वर्षा होने लगी है। इससे गन्ने के जमाव और फुटाव पर असर पड़ता है, जिससे उत्पादन घट जाता है।
रोग और कीटों से बढ़ी चुनौती
मंत्री ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से गन्ने की प्रमुख अगेती किस्मों सीओ-0238 और सीओ-0118 में चोटी तथा जड़ बेधक कीटों का प्रकोप बढ़ा है। इसके साथ ही उखड़ा रोग जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं, जिससे पैदावार और कुल उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि गन्ने की खेती को फिर से लाभकारी बनाने के लिए कृषि विभाग कई योजनाएं चला रहा है। किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार हर वर्ष अधिकतम राज्य सलाहकार मूल्य घोषित करती है। इसके अलावा किसानों को आधुनिक खेती की जानकारी देने के लिए किसान गोष्ठियां, मेले और वैज्ञानिक संवाद आयोजित किए जाते हैं। पिछले पांच वर्षों में 225 किसान गोष्ठियों, 15 किसान मेलों और 41 किसान वैज्ञानिक संवादों के माध्यम से 28 हजार से अधिक किसानों को जागरूक किया गया है।
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