देश में मछली उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है और अब यह 195 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। केन्द्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में तालाब, नदी और अन्य आधुनिक तकनीकों से बड़े पैमाने पर मछली पालन हो रहा है। खासकर इनलैंड फिशरीज यानी आंतरिक जल स्रोतों से उत्पादन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इस बीच झारखंड के रांची स्थित मत्स्य निदेशालय के फिश ट्रेनिंग सेंटर के चीफ इंस्ट्रक्टर प्रशांत कुमार दीपक ने मछली पालन शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए तालाब निर्माण से जुड़ी अहम जानकारियां साझा की हैं।
उनके अनुसार मछली पालन की शुरुआत में सबसे महत्वपूर्ण कदम है तालाब का सही निर्माण। ऐसा स्थान चुनना बेहद जरूरी है जहां बारिश का पानी आसानी से इकट्ठा हो सके और तालाब में पूरे साल पानी बना रहे। तालाब की मिट्टी की बनावट, उसकी गुणवत्ता, पानी की गहराई और हवा के बहाव को ध्यान में रखकर तालाब का डिजाइन तय करना चाहिए। मिट्टी के चयन में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। अगर मिट्टी अत्यधिक अम्लीय या क्षारीय होगी तो मछलियों की वृद्धि पर असर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि चिकनी, दोमट और लोम मिट्टी तालाब के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
तालाब की गहराई भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहद जरूरी है। सामान्य रूप से इसकी गहराई 4 से 6 फीट होनी चाहिए ताकि सूरज की रोशनी जल के भीतर तक पहुंच सके, जिससे जल में ऑक्सीजन की मात्रा बनी रहे। यदि तालाब पूरी तरह बारिश के पानी पर निर्भर हो, तो उसकी गहराई 8 से 10 फीट तक रखी जानी चाहिए। साथ ही, तालाब को पूर्व से पश्चिम दिशा में बनाना बेहतर माना जाता है ताकि हवा के प्राकृतिक प्रवाह से जल में हलचल हो और ऑक्सीजन का स्तर बढ़े।
मिट्टी की उपयुक्तता जांचने के लिए उन्होंने एक सरल तकनीक भी बताई। खुदाई से पहले 3×3 फीट के क्षेत्र में तीन से पांच फीट गहरा गड्ढा बनाकर मिट्टी निकालें, फिर उस मिट्टी को पानी में गीला करके उसका गोला बनाएं और हवा में उछालें। अगर गोला टूट जाए तो मिट्टी तालाब निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, और यदि गोला सही सलामत रहे और बेलनाकार रूप में ढल जाए तो वह मिट्टी आदर्श मानी जाती है।
तालाब का आकार भी मछली पालन की सफलता में बड़ा कारक है। आयताकार तालाब और 2:1 या 3:1 का अनुपात अधिक प्रभावी माना गया है। इसके अलावा, कुल ली गई भूमि का 70-75 प्रतिशत हिस्सा ही जल क्षेत्र के लिए उपयोग में आता है, शेष भाग पर तालाब की मेड़ या बांध बनते हैं। एक एकड़ का तालाब बनाने के लिए लगभग 1.35 से 1.40 एकड़ जमीन की जरूरत होती है।
अंततः तालाब की संरचना, मिट्टी की गुणवत्ता, पानी की गहराई और तालाब का रख-रखाव – ये सभी मछली की ग्रोथ को सीधे प्रभावित करते हैं। मछलियों का बाज़ार भाव उनके वजन और आकार के हिसाब से तय होता है, इसलिए अगर तालाब वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया हो, तो मछली पालन न सिर्फ लाभदायक साबित हो सकता है बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और आय के नए स्रोत के रूप में भी उभर सकता है।
