नई दिल्ली: कपास उगाने वाले किसानों के लिए जुलाई और अगस्त का समय बेहद सतर्कता का होता है। इस समय पर कपास की सबसे घातक कीटों में से एक गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का प्रकोप तेजी से फैल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस कीट पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो किसान को उसकी मेहनत का बड़ा खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है। उत्पादन में 30 से 90 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है, वहीं कपास के रेशे की गुणवत्ता भी गंभीर रूप से प्रभावित होती है, जिससे बाज़ार में भाव भी घट जाते हैं।गुलाबी सुंडी का वैज्ञानिक नाम Pectinophora gossypiella है और यह मुख्य रूप से कपास की फसल पर हमला करती है। यह कीट कपास की फलियों (बोल्स) के अंदर घुसकर बीज और रेशे को नष्ट कर देती है। शुरू में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन जब तक किसान समझ पाते हैं, तब तक फसल को बड़ा नुकसान हो चुका होता है।
क्या हैं गुलाबी सुंडी के लक्षण?
गुलाबी सुंडी के शुरुआती लक्षणों में कपास की फलियों पर छोटे छेद नजर आते हैं। यह कीट फलियों में घुसकर बीज को खा जाती है और अंदर ही अंदर पूरी फली को सड़ा देती है। संक्रमित फलियां समय से पहले गिरने लगती हैं या ठीक से नहीं खुलतीं। यदि फली को खोलकर देखा जाए तो अंदर की बीजियां सड़ी, बदरंग और कभी-कभी खाली भी पाई जाती हैं। साथ ही, कपास का रेशा चिपचिपा और कमज़ोर हो जाता है। इन सब संकेतों के साथ फली के भीतर एक गुलाबी रंग की इल्ली (सुंडी) साफ नजर आती है, जिससे इस कीट का नाम पड़ा है – गुलाबी सुंडी।
किस तरह होता है नुकसान?
गुलाबी सुंडी का असर सीधे फसल की पैदावार और गुणवत्ता पर पड़ता है। एक तरफ उपज में भारी कमी आती है, वहीं दूसरी ओर कपास के रेशे की गुणवत्ता घटने के कारण उसका बाज़ार मूल्य भी कम हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कीट एक सीजन में कई चक्रों में हमला कर सकती है और यदि रोकथाम के उपाय नहीं किए गए, तो नुकसान लाखों में पहुंच सकता है।
जीवनचक्र और प्रजनन
गुलाबी सुंडी अपने जीवनचक्र में अंडा, लार्वा (सुंडी), प्यूपा और वयस्क पतंगे के रूप में बदलती है। मादा कीट कपास की पत्तियों और फूलों पर अंडे देती है, जिससे कुछ ही समय में सुंडी निकलकर कपास की फली में प्रवेश कर जाती है। यहां यह बीज और रेशा खाती है। इसके बाद सुंडी प्यूपा में बदल जाती है और अंततः वयस्क कीट के रूप में फिर से प्रजनन शुरू कर देती है। इस चक्र को तोड़ना ही कीट प्रबंधन की कुंजी है।
कैसे करें गुलाबी सुंडी की पहचान और रोकथाम?
विशेषज्ञों के मुताबिक, गुलाबी सुंडी के प्रकोप की पहचान के लिए नियमित फसल निगरानी बेहद जरूरी है। यदि 10 में से 2 फलियों में संक्रमण के लक्षण नजर आएं, तो तत्काल नियंत्रण के उपाय करने चाहिए।
जैविक नियंत्रण उपाय
फेरोमोन ट्रैप: खेत में फेरोमोन ट्रैप लगाकर नर कीटों को आकर्षित कर पकड़ा जा सकता है। प्रति एकड़ 5-6 ट्रैप लगाने की सलाह दी जाती है।
परजीवी कीट: Trichogramma chilonis जैसे परजीवी कीट गुलाबी सुंडी के अंडों को नष्ट कर देते हैं। इन कीटों को ट्राइकोकार्ड के माध्यम से खेत में छोड़ा जा सकता है।
रासायनिक नियंत्रण उपाय
संक्रमण अधिक होने की स्थिति में निम्न दवाओं का छिड़काव किया जा सकता है:
इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG – 220 ग्राम प्रति हेक्टेयर
स्पिनोसेड 45% SC – 75 मिली प्रति हेक्टेयर
इंडॉक्साकार्ब 14.5% SC – 500 मिली प्रति हेक्टेयर
इन दवाओं को 500 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़कें। यह कार्य शाम के समय करें जब कीटों की सक्रियता अधिक होती है।
अन्य उपाय
फसल कटाई के बाद खेत में बचे हुए कपास के पौधों और फलियों को नष्ट कर दें, ताकि अगली पीढ़ी के कीट न पनप सकें। एक ही खेत में हर साल कपास न लगाएं। फसल चक्र अपनाएं और कपास के बाद अन्य फसलें जैसे गेहूं, चना, मूंग आदि बोएं। साथ ही, खेतों की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी में छिपे प्यूपा नष्ट हो जाएं।
बीटी कपास के बावजूद क्यों होता है प्रकोप?
हाल के वर्षों में देखा गया है कि बीटी कपास की कुछ किस्मों में भी गुलाबी सुंडी का प्रकोप देखा गया है। इसका कारण कीटों का धीरे-धीरे प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना है। इसलिए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे दोहरी जीन (double gene) वाली बीटी कपास किस्मों का चुनाव करें और हर मौसम में कीट प्रबंधन की रणनीति बदलते रहें।
कृषि विभाग की सलाह
कृषि विभाग किसानों से अपील कर रहा है कि वे नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करें, फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करें और कीट के शुरुआती लक्षण दिखते ही विशेषज्ञ सलाह लेकर दवाओं का छिड़काव करें। समय रहते किए गए ये उपाय फसल को भारी नुकसान से बचा सकते हैं और कपास की गुणवत्ता एवं उपज दोनों को बनाए रख सकते हैं। गुलाबी सुंडी कपास की फसल के लिए एक गंभीर खतरा है। लेकिन वैज्ञानिक तरीकों से निगरानी और समय पर नियंत्रण के जरिए किसान इस कीट पर काबू पा सकते हैं। सतर्कता ही इसका सबसे बड़ा इलाज है। किसान भाइयों को चाहिए कि वे नियमित खेत भ्रमण करें, सावधानी बरतें और विशेषज्ञों से समय-समय पर सलाह लेते रहें।
