पशुपालन

मछली के साथ बत्तख पालन: एक एकड़ तालाब से लाखों की कमाई संभव

नई दिल्ली: खेती की पारंपरिक आय से आगे बढ़कर आज के किसान सहायक व्यवसायों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य है खेती से जुड़ी लागत को घटाना और आय को बढ़ाना। ऐसे ही एक लाभकारी मॉडल के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है – मछली के साथ बत्तख पालन (Duck with Fish Farming)। कृषि और पशुपालन विशेषज्ञों की मानें, तो यह मॉडल किसानों को दोहरा लाभ देने के साथ-साथ कम लागत में अधिक उत्पादन का अवसर भी देता है। आज देशभर में कई ऐसे किसान हैं, जो पारंपरिक मछली पालन के साथ बत्तख पालन को अपनाकर लाखों की आमदनी कमा रहे हैं। यह मॉडल खासतौर पर उन किसानों के लिए अत्यधिक उपयोगी है, जिनके पास बारहमासी तालाब उपलब्ध हैं और जो मत्स्य पालन पहले से कर रहे हैं।

कैसे करती है बत्तख मछली पालन में मदद?

तालाबों में बत्तखों का तैरना सिर्फ एक दृश्य नहीं है, बल्कि मछली पालन के लिए यह बेहद उपयोगी प्रक्रिया है। बत्तखें तालाब में तैरने से पानी के ऑक्सीजन स्तर को संतुलित बनाए रखती हैं, जिससे मछलियों की वृद्धि बेहतर होती है। इसके अलावा, बत्तखों की बीट तालाब में गिरने से मछलियों को प्राकृतिक भोजन भी मिल जाता है, जिससे कृत्रिम फीड पर खर्च घटता है। यही कारण है कि मछली पालन की कुल लागत में 75% तक की कमी देखी गई है।

तालाब और बत्तख आवास की संरचना कैसी हो?

इस मॉडल को अपनाने के लिए जरूरी है कि किसान 1.5 से 2 मीटर गहराई वाले बारहमासी तालाब का चयन करें। तालाब के किनारे या ऊपर बांस और लकड़ी से हवादार व सुरक्षित बत्तख शेड बनाना चाहिए। बत्तखों को दिन में तालाब में छोड़ना चाहिए, जबकि रात में उन्हें शेड में रखना आवश्यक है। प्रति बत्तख 2 वर्गफुट जगह की आवश्यकता होती है।

किस प्रजाति की बत्तखें पालनी चाहिए?

बत्तख पालन के लिए विशेषज्ञ ‘इंडियन रनर’ प्रजाति को अच्छी मानते हैं, जबकि अंडा उत्पादन के लिए ‘खाकी कैम्पबेल’ सबसे उपयुक्त मानी जाती है। एक खाकी कैम्पबेल बत्तख सालभर में लगभग 250 अंडे देती है। आमतौर पर ये बत्तखें 24 सप्ताह की उम्र में अंडे देना शुरू कर देती हैं और लगभग दो साल तक अंडा उत्पादन करती हैं। एक एकड़ तालाब में 250 से 300 बत्तखें आसानी से पाली जा सकती हैं।

मछली पालन में क्या रखें ध्यान?

बत्तखों के साथ मछली पालन करते समय एक बात का विशेष ध्यान देना चाहिए – स्पान (मछली के अंडे) नहीं डालना चाहिए, क्योंकि बत्तख इन्हें खा सकती हैं। इसकी बजाय, फिंगरलिंग (छोटी मछलियां) डालनी चाहिए। एक एकड़ तालाब में 4,000 से 5,000 फिंगरलिंग छोड़ी जा सकती हैं, जिसमें रोहू, कतला, मृगाल जैसी विभिन्न प्रजातियों को शामिल करें। इससे तालाब के अलग-अलग स्तरों पर मौजूद भोजन का बेहतर उपयोग होता है और उत्पादन बढ़ता है।

मछली और बत्तख को क्या खिलाएं?

मछलियों के लिए सरसों की खली, धान की भूसी, मिनरल मिक्सचर और बाजार में उपलब्ध रेडी फीड उपयोगी हैं। इसे बोरे में भरकर तालाब में आधा डुबोकर लटकाया जा सकता है। 6 से 9 महीने में मछलियां 1 किलो तक की हो जाती हैं और 18 से 25 क्विंटल तक उत्पादन एक एकड़ में संभव है। बत्तखों के आहार में घास, बरसीम, सब्जियों के छिलके, भूसी, मिनरल मिक्सचर और रेडी फीड शामिल किया जा सकता है। सामान्यत: एक बत्तख को रोजाना 120 ग्राम दाना देना होता है, लेकिन डक-विद-फिश मॉडल में यही आवश्यकता 60–70 ग्राम में पूरी हो जाती है, क्योंकि तालाब से उन्हें अतिरिक्त पोषण मिल जाता है।

लाखों की कमाई का मौका

इस मिश्रित मॉडल के ज़रिए किसान दोहरा लाभ उठा सकते हैं। एक एकड़ तालाब से 20–25 क्विंटल मछली उत्पादन संभव है, जिससे किसानों को 5 से 6 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है। वहीं, बत्तखों से 3 से 4 लाख रुपये तक सालाना आमदनी अंडा और मांस के रूप में हो सकती है। पूर्वी भारत के राज्यों में बत्तख के अंडों की भारी मांग है, जिसे देखकर व्यापारी भी गांवों तक पहुंच रहे हैं।

सरकार और विशेषज्ञों की राय

कृषि वैज्ञानिक और पशुपालन विभाग इस मॉडल को ग्रामीण क्षेत्रों में सतत आय के स्रोत के रूप में बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार कई योजनाओं के तहत मछली पालन और बत्तख पालन पर अनुदान और प्रशिक्षण भी देती है। किसानों को चाहिए कि वे कृषि विज्ञान केंद्र या पशुपालन विभाग से संपर्क कर इसकी जानकारी लें और इस नए मॉडल को अपनाकर आर्थिक रूप से सशक्त बनें। मछली पालन के साथ बत्तख पालन सिर्फ एक नया विचार नहीं, बल्कि किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ का ठोस उपाय है। अगर वैज्ञानिक तरीके से तालाब प्रबंधन, आहार व्यवस्था और प्रजातियों का चयन किया जाए, तो यह व्यवसाय ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़ बन सकता है।

Related posts

Leave a Comment