नई दिल्ली: धान की खेती में यूरिया का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है, लेकिन आवश्यकता से अधिक यूरिया डालने से किसानों की लागत बढ़ने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। यही कारण है कि अब कृषि वैज्ञानिक और सरकार संतुलित पोषण प्रबंधन पर जोर दे रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा के वैज्ञानिकों ने ऐसी वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी है, जिनकी मदद से किसान फसल की जरूरत के अनुसार ही यूरिया का उपयोग कर सकते हैं और उत्पादन पर बिना असर डाले उर्वरक की बचत कर सकते हैं।
चार सिद्धांतों से तय करें यूरिया की सही मात्रा
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन का आधार चार प्रमुख सिद्धांत हैं। इनमें सही मात्रा, सही समय, सही तरीका और सही स्रोत का चयन शामिल है। यदि फसल को उसकी आवश्यकता के अनुसार सही समय पर पोषक तत्व दिए जाएं, तो यूरिया की बर्बादी कम होती है और पौधों को पूरा लाभ मिलता है।
आधुनिक उपकरणों से पहचानें फसल की जरूरत
फसल में नत्रजन की कमी का पता लगाने के लिए अब कई आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। ग्रीन सीकर नामक उपकरण पौधों में नत्रजन की कमी का आकलन करता है। इसके उपयोग से आवश्यकता से अधिक यूरिया डालने की जरूरत नहीं पड़ती और लगभग बीस प्रतिशत तक नत्रजन की बचत संभव होती है। क्लोरोफिल मापक यंत्र भी किसानों के लिए उपयोगी साधन है। यह पत्तियों के रंग और उनमें मौजूद हरित वर्णक के आधार पर बताता है कि फसल को कितनी मात्रा में नत्रजन की आवश्यकता है। इससे उर्वरक का संतुलित उपयोग करने में सहायता मिलती है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने ऐसा संगणकीय परामर्श तंत्र भी विकसित किया है, जो खेत और फसल की जानकारी के आधार पर उर्वरक प्रबंधन की सटीक सलाह देता है।
पत्ती के रंग से भी जान सकते हैं यूरिया की जरूरत
किसानों के लिए सबसे सरल और सस्ता उपाय पत्ती रंग पट्टी है। इसकी सहायता से खेत में खड़े होकर पत्तियों के रंग का मिलान किया जा सकता है और उसी के आधार पर नत्रजन की आवश्यकता का अनुमान लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार खेत से कम से कम दस स्वस्थ पौधों का चयन करना चाहिए। सुबह आठ से दस बजे के बीच, जब तेज धूप न हो, उसी समय पत्तियों के रंग का मिलान करना सबसे उपयुक्त रहता है। पूरे खेत में एक ही व्यक्ति द्वारा रंग का मिलान करने से परिणाम अधिक सटीक मिलते हैं।
धान की किस्म के अनुसार बदलती है यूरिया की मात्रा
धान की अलग-अलग किस्मों के लिए नत्रजन की आवश्यकता भी अलग होती है। खरीफ मौसम के सामान्य धान में यदि पत्ती रंग पट्टी का मान चार या उससे कम हो, तो प्रति हेक्टेयर अट्ठाईस किलोग्राम नत्रजन देने की सलाह दी जाती है। बासमती धान और सीधी बुवाई वाले सामान्य धान में यह मान तीन या उससे कम होने पर प्रति हेक्टेयर तेईस किलोग्राम नत्रजन पर्याप्त माना जाता है। बोरो धान में पत्ती रंग पट्टी का मान चार या उससे कम होने पर प्रति हेक्टेयर पैंतीस किलोग्राम नत्रजन देने की अनुशंसा की जाती है।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन से बढ़ेगा मुनाफा
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि वैज्ञानिक तकनीकों के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करने से खेती की लागत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल यूरिया की बचत कर सकते हैं, बल्कि बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं।
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