पटना: बिहार सरकार ने कृषि कार्यों के लिए बिजली का उपयोग करने वाले किसानों के लिए बिलिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब तक किसानों को लगभग तीन महीने के अंतराल पर बिजली बिल जारी किया जाता था, लेकिन 1 जुलाई 2026 से मासिक बिलिंग व्यवस्था लागू कर दी गई है। सरकार का मानना है कि इससे किसानों पर एकमुश्त बिल का बोझ कम होगा, हालांकि इस फैसले को लेकर किसानों की अलग-अलग राय सामने आ रही है।
हर महीने जारी होगा बिजली बिल
हाल ही में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किसानों को सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक कृषि कार्यों के लिए बिजली उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। अब इसी क्रम में साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के महाप्रबंधक (राजस्व) अरविंद कुमार ने सभी संबंधित अधिकारियों को पत्र जारी कर नई व्यवस्था लागू करने की जानकारी दी है।
पत्र के अनुसार, बिहार विद्युत विनियामक आयोग ने सिंचाई कृषि सेवा श्रेणी-1 के अंतर्गत आने वाले ट्यूबवेल, बोरवेल और पंपसेट उपभोक्ताओं के लिए मौसमी बिलिंग व्यवस्था समाप्त कर मासिक बिलिंग प्रणाली लागू करने की मंजूरी दी है। इसके तहत अब किसानों को हर महीने बिजली बिल जारी किया जाएगा।
किसानों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
रोहतास के किसान अर्जुन सिंह का कहना है कि पहले एक बार में करीब 2,400 रुपये का बिजली बिल जमा करना पड़ता था, जिससे परेशानी होती थी। अब हर महीने कम राशि का बिल आने से भुगतान करना आसान होगा। वे सब्जी की खेती करते हैं और नियमित सिंचाई की आवश्यकता होने के कारण उन्हें इस बदलाव से राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं, दरभंगा के किसान धीरेंद्र का कहना है कि धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों में पूरे मौसम में केवल कुछ बार ही सिंचाई करनी पड़ती है। ऐसे किसानों की आमदनी भी फसल बिकने के बाद ही आती है। ऐसे में हर महीने बिजली बिल का भुगतान करना उनके लिए कठिन हो सकता है।
आठ लाख से अधिक कृषि उपभोक्ता होंगे प्रभावित
राज्य में कृषि बिजली फीडरों से जुड़े करीब आठ लाख उपभोक्ता हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मासिक बिलिंग से बिजली खपत की नियमित निगरानी होगी और एकमुश्त बिल का दबाव भी कम होगा। पटना के किसान अभिजीत सिंह का कहना है कि यदि किसी किसान का वार्षिक बिजली बिल 4,800 रुपये है, तो पहले तीन महीने में करीब 1,200 रुपये का बिल आता था, जबकि अब हर महीने लगभग 400 रुपये का भुगतान करना होगा, जिससे एक बार में अधिक राशि जमा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
पारंपरिक किसानों की बढ़ सकती है चिंता
बिहार में अभी भी अधिकांश किसान धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते हैं, जिनमें सिंचाई की आवश्यकता पूरे साल नियमित नहीं रहती। ऐसे किसानों का मानना है कि बिजली का उपयोग कम होने के बावजूद हर महीने बिल आने से भुगतान का दबाव बढ़ सकता है। वहीं, आधुनिक और व्यावसायिक खेती करने वाले किसानों के लिए यह व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक साबित हो सकती है।
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