कृषि पिटारा

बाजरा खरीद में सरकार की ओर से उपेक्षापूर्ण रवैया, हरियाणा ने किया रिकॉर्ड खरीद

मोटे अनाजों को ‘श्री अन्न’ का दर्जा दिए जाने के बावजूद, सरकारी नीति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। देश में बाजरे के कुल उत्पादन का केवल 5.88 प्रतिशत ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदा गया है। देश के सबसे बड़े बाजरा उत्पादक राज्य राजस्थान में तो इसके एक दाने की भी सरकारी खरीद नहीं हुई। बाजार में बाजरे के दाम MSP से कम होने के बावजूद, हरियाणा सरकार ने इस मामले में बेहतर काम किया है। हरियाणा ने बाजरा की खरीद में 81 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

साल 2024-25 के दौरान देश में कुल 93.7 लाख टन बाजरा हुआ है। केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा 10 फरवरी को जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान कुल 5,53,356 मीट्रिक टन बाजरा खरीदा गया, जिसमें से 4,48,387 मीट्रिक टन हरियाणा में खरीदा गया। हालांकि, हरियाणा का देश में बाजरा उत्पादन में केवल 13 प्रतिशत हिस्सा है, फिर भी इस राज्य ने बाजरे की कुल सरकारी खरीद में 81 प्रतिशत का हिस्सा लिया है।

उत्तर प्रदेश और गुजरात ने भी बाजरा खरीद में योगदान किया है। उत्तर प्रदेश में 1,01,150 मीट्रिक टन बाजरा MSP पर खरीदा गया, जो कुल खरीद का 18 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश देश के बाजरा उत्पादन में 21.30 प्रतिशत का हिस्सा रखता है। वहीं गुजरात में केवल 3,934 मीट्रिक टन बाजरा खरीदा गया है, जबकि राज्य का बाजरा उत्पादन में 12.02 प्रतिशत हिस्सा है।

राजस्थान, जो देश का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक राज्य है और जिसका बाजरा उत्पादन में 47.5 प्रतिशत हिस्सा है, यहां किसानों को निराशा का सामना करना पड़ा है। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट के अनुसार, राजस्थान में एक दशक से बाजरे की MSP पर कोई खरीद नहीं हुई, जिससे किसानों को अपनी उपज नुकसान में बेचने की मजबूरी आई है।

हरियाणा में 1,58,452 किसानों ने MSP पर बाजरा बेचा और उन्हें 1173.36 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। उत्तर प्रदेश के 16,745 किसानों से बाजरा खरीदा गया, जिसके बदले 266.64 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। हालांकि, बाजरे का MSP 2625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, लेकिन बाजरे का औसत बाजार दाम MSP से कम ही रहता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट’ के रूप में मनाया गया, लेकिन इसके बाद से बाजरे की उपेक्षा होती दिख रही है। मिलेट्स की खेती कम पानी और कम खाद में होती है, इस कारण इसे पर्यावरण के लिए भी अच्छा माना जाता है। यदि सरकारों का यही रवैया रहा, तो राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी किसानों के लिए बाजरा की खेती करना मुश्किल हो जाएगा। पंजाब में भी किसान अब बाजरा की खेती से मुंह मोड़ चुके हैं। सरकारी खरीद में सुधार के बिना, बाजरे की खेती के मामले में निराशा और गिरावट जारी रहने की संभावना है।

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