नई दिल्ली: गन्ना भारत की सबसे प्रमुख नकदी फसलों में से एक है, जिसकी खेती उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है। लंबे समय से देश के किसान गन्ने की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, बदलते पर्यावरण, गिरते भूजल स्तर और मिट्टी की घटती उर्वरता को देखते हुए अब किसानों का रुझान तेजी से प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा है। यह पद्धति पूरी तरह से जैविक और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होती है, जिसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता है। देशी गाय, पारंपरिक बीजों, जीवामृत, घनजीवामृत और बीजामृत जैसे घरेलू संसाधनों से की जाने वाली यह खेती न केवल उत्पादन लागत को काफी कम करती है, बल्कि मिट्टी की सेहत को सुधारकर लंबे समय तक टिकाऊ पैदावार की गारंटी देती है।
पारंपरिक खेती की चुनौतियां और प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता महत्व
गन्ने की पारंपरिक खेती में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी में प्राकृतिक जैविक पदार्थों की भारी कमी हो जाती है, जिससे जमीन धीरे-धीरे बंजर और बेजान होने लगती है। इसके विपरीत प्राकृतिक खेती में खेतों में देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से निर्मित जीवामृत का छिड़काव किया जाता है, जिससे मिट्टी में हितकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। ये सूक्ष्मजीव पौधों को आवश्यक पोषण प्रदान करने के साथ-साथ खेत की नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके अलावा पारंपरिक खेती में कीट नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हानिकारक रसायन मिट्टी के मित्र कीटों को भी नष्ट कर देते हैं, जबकि प्राकृतिक खेती में नीम अर्क, गोमूत्र और दशपर्णी अर्क जैसे सुरक्षित तरीकों से कीटों को नियंत्रित किया जाता है जो पूरी तरह से किफायती और पर्यावरण के अनुकूल हैं।
जल संरक्षण लागत में कमी और गन्ने की प्राकृतिक खेती के दूरगामी लाभ
जल संरक्षण के दृष्टिकोण से भी गन्ने की प्राकृतिक खेती अत्यंत प्रभावकारी साबित हो रही है, क्योंकि इसमें आच्छादन और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाकर पानी की खपत को काफी हद तक घटाया जाता है। इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान को बाजार से महंगे उर्वरक और कीटनाशक नहीं खरीदने पड़ते, जिससे फसल की कुल लागत में भारी कमी आती है। प्राकृतिक रूप से उत्पादित गन्ने और उससे तैयार किए गए गुड़ या चीनी की बाजार में बहुत अधिक मांग रहती है, जिससे किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर और प्रीमियम मूल्य मिलता है। उत्तर प्रदेश के शामली, मुजफ्फरनगर और बरेली जैसे जिलों के कई जागरूक किसानों ने इस जैविक बदलाव को अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यह पर्यावरण हितैषी पद्धति आने वाले समय में देश के कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाएगी।
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