नई दिल्ली: भारत में अरहर की खेती करने वाले किसानों के लिए उन्नत किस्मों का चयन हमेशा से ही उच्च उत्पादन और बेहतर आय का मुख्य आधार रहा है। इसी दिशा में अरहर की ICPL 87 किस्म, जिसे कृषि जगत में प्रगति के नाम से भी जाना जाता है, किसानों के बीच एक अत्यंत लोकप्रिय और लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान के संयुक्त प्रयासों से विकसित की गई है। यह एक कम समय में पककर तैयार होने वाली, उच्च उत्पादकता देने वाली और प्रमुख बीमारियों से सुरक्षित रहने वाली बेहतरीन किस्म है, जो पारंपरिक किस्मों की तुलना में किसानों को कम समय और सीमित संसाधनों में अधिक मुनाफा कमाने का अवसर प्रदान करती है।
प्रगति किस्म की मुख्य विशेषताएं और फसल चक्र की समय सीमा
इस उन्नत किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी परिपक्वता अवधि है, जो मात्र एक सौ दस से एक सौ तीस दिनों के भीतर पूरी हो जाती है। जल्दी कटाई के योग्य होने के कारण यह फसल उन किसानों के लिए बेहद उपयोगी है जो एक ही खेत से वर्ष में multiple फसलें लेना चाहते हैं। इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं जिनमें शाखाओं का विकास बहुत अच्छा होता है, जिससे प्रति पौधा फलियों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज की जाती है। इसके बीज आकर्षक भूरे रंग के होते हैं तथा इसके एक सौ बीजों का औसत वजन लगभग आठ ग्राम के करीब होता है। उत्पादन क्षमता के मामले में यह किस्म काफी आगे है और उचित देखरेख के साथ इससे प्रति हेक्टेयर ग्यारह से चौदह क्विंटल तक औसतन उपज बहुत आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता और कीट प्रबंधन से जुड़ी आवश्यक सावधानियां
यह किस्म विशेष रूप से अरहर की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख रोगों जैसे उकठा रोग और बांझपन मोज़ेक रोग के प्रति प्राकृतिक रूप से अत्यधिक सहनशील पाई गई है। हालांकि कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म फली छेदक कीट के प्रति थोड़ी संवेदनशील होती है, जिसके लिए समय पर उचित कीट नियंत्रण उपायों को अपनाना बेहद आवश्यक माना जाता है। इसके अतिरिक्त यह किस्म कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए भी पूरी तरह से अनुकूल है, विशेष रूप से ऐसे इलाके जहां वार्षिक वर्षा चार सौ पचास मिलीमीटर से कम होती है। यह विभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाई जा सकती है, लेकिन मध्यम से गहरी उपजाऊ मिट्टी इसके अधिकतम उत्पादन के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है।
बीजारोपण की सही तकनीक उर्वरक प्रबंधन और पुनः फसल लेने का लाभ
इस किस्म से बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए बीजारोपण के समय दो पंक्तियों के बीच तीस सेंटीमीटर और दो पौधों के बीच दस सेंटीमीटर की दूरी रखना सबसे उपयुक्त रहता है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन के तहत खेत की तैयारी और बुआई के समय प्रति हेक्टेयर एक सौ किलोग्राम डीएपी का प्रयोग करने से पौधों का विकास तेजी से होता है और फलियों का वजन बढ़ता है। इस किस्म की एक और अनूठी विशेषता इसकी पुनः फसल लेने की अद्भुत क्षमता है, यानी एक बार मुख्य फसल की कटाई के बाद उसी पौधे से दोबारा फसल प्राप्त की जा सकती है। यह विशेषता किसानों को बहुत ही कम अतिरिक्त लागत में दोबारा अच्छी उपज प्रदान करती है, जिससे उनकी कुल शुद्ध आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है।
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