खेती-किसानी

गेहूं की आखिरी सिंचाई का सही समय और तरीका

last irrigation of wheat

नई दिल्ली: गेहूं की खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता तय करने में सबसे निर्णायक भूमिका “आखिरी सिंचाई” की होती है। यही वह समय है जब किसान अपनी मेहनत का पूरा लाभ सुनिश्चित कर सकते हैं। यदि गेहूं की आखिरी सिंचाई सही समय पर और सही तरीके से की जाए, तो गेहूं के दाने अच्छे से भरते हैं, मोटे, चमकदार और वजनदार बनते हैं, जिससे उपज में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी संभव है। वहीं, इस चरण में लापरवाही बरतने पर दाने सिकुड़ जाते हैं, भराव ठीक से नहीं हो पाता और पैदावार को भारी नुकसान हो सकता है।

मिट्टी के प्रकार के अनुसार आखिरी सिंचाई का सही समय

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आखिरी सिंचाई का समय मिट्टी की बनावट और नमी धारण क्षमता के अनुसार तय करना चाहिए। भारी और चिकनी मिट्टी वाले क्षेत्रों में पानी को लंबे समय तक रोकने की क्षमता अधिक होती है। ऐसे में जब गेहूं के दानों में “मिल्किंग स्टेज” यानी दूध भरने की अवस्था आए, तब अंतिम सिंचाई करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवस्था में दाने को दबाने पर दूध जैसा तरल निकलता है।

रेतीली और दोमट मिट्टी में पानी जल्दी सूख जाता है, इसलिए यहां किसानों को मिल्किंग स्टेज के कुछ दिन बाद सिंचाई करनी चाहिए। जब दाना दबाने पर दूध न निकले और थोड़ा सख्त महसूस होने लगे, तब अंतिम पानी देना सही रहता है। बहुत अधिक रेतीली मिट्टी वाले इलाकों में बालियां पीली पड़ने या ऊपरी पत्ती सूखने की शुरुआत को भी अंतिम सिंचाई का संकेत माना जाता है।

सिंचाई करते समय बरतें ये सावधानियां

अंतिम सिंचाई के समय तेज हवाओं का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। यदि पानी देने के बाद तेज हवा चलती है और फसल गिर जाती है, तो पैदावार में 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। इसलिए सिंचाई हमेशा शांत मौसम में करें। किसान मोबाइल ऐप या मौसम पूर्वानुमान के जरिए यह सुनिश्चित कर लें कि अगले 4-5 दिनों तक आंधी-तूफान की संभावना न हो। यदि दिन में हवा चल रही हो, तो रात के समय सिंचाई करना अधिक सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

अंतिम चरण में खाद प्रबंधन भी जरूरी

इस अवस्था में नाइट्रोजन का अधिक उपयोग नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि इससे पौधा जरूरत से ज्यादा लंबा और कमजोर हो जाता है, जिससे गिरने की आशंका बढ़ जाती है। इसके बजाय पोटाश और फास्फोरस का संतुलित प्रयोग या स्प्रे करना लाभकारी होता है। पोटाश तने को मजबूती देता है और दानों को वजनदार बनाता है।

इसके अलावा दाना बनने की अवस्था में बोरॉन की कमी से बालियां सूख सकती हैं या दाने छोटे रह सकते हैं। ऐसे में बोरॉन का छिड़काव कर किसान अपनी फसल की गुणवत्ता और उपज दोनों को बेहतर बना सकते हैं।

कुल मिलाकर, गेहूं की फसल में आखिरी सिंचाई सही समय, सही विधि और उचित पोषक तत्वों के साथ की जाए, तो किसान बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आमदनी सुनिश्चित कर सकते हैं।

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