नई दिल्ली: देश के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में पिछले कुछ महीनों से किसानों को अपनी उपज के बेहद कम दाम मिल रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है। कई मंडियों में किसानों को आलू 4 से 6 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बेचना पड़ रहा है, जो लागत से भी कम है। ऐसे हालात किसानों के लिए अगली फसल की बुवाई को मुश्किल बना रहे हैं और कर्ज का बोझ बढ़ने की आशंका भी बढ़ गई है।
उत्तर प्रदेश में कमजोर बने रहे आलू के भाव
उत्तर प्रदेश की कई प्रमुख मंडियों में आलू के दाम काफी नीचे स्तर पर बने हुए हैं। कन्नौज, अमरोहा और फर्रुखाबाद जैसी मंडियों में 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक के न्यूनतम भाव दर्ज किए गए हैं। वहीं कुछ मंडियों में अधिकतम कीमत 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंची, लेकिन यह स्तर भी किसानों के लिए संतोषजनक नहीं माना जा रहा। 20 अप्रैल को दोपहर तक राज्य की मंडियों में करीब 4631.99 मीट्रिक टन आलू की आवक दर्ज की गई, जिससे सप्लाई अधिक होने के कारण कीमतों पर दबाव बना रहा।
पश्चिम बंगाल में भी नहीं मिल रहे बेहतर दाम
पश्चिम बंगाल की मंडियों में भी आलू के भाव किसानों को निराश कर रहे हैं। यहां ज्योति और स्थानीय किस्मों के दाम 400 से 1100 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहे। बारासात जैसी कुछ मंडियों में ऊंचे दाम देखने को मिले, लेकिन अधिकांश जगहों पर औसत कीमत 500 से 800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही सीमित रही। राज्य में कुल लगभग 1901.25 मीट्रिक टन आलू की आवक दर्ज की गई, जिससे बाजार में आपूर्ति बनी रहने के कारण कीमतों में खास सुधार नहीं हो पाया।
गुजरात में भी कीमतों में बड़ा अंतर
गुजरात की मंडियों में आलू के दामों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। यहां 300 रुपये से लेकर 1800 रुपये प्रति क्विंटल तक कीमत दर्ज की गई। हालांकि ज्यादातर मंडियों में औसत भाव 700 से 1400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही रहा। राज्य में करीब 1457.84 मीट्रिक टन आलू की आवक हुई, लेकिन कीमतों में स्थिरता नहीं बन पाई।
किसानों के सामने बढ़ी चिंता
लगातार कम दाम मिलने से किसानों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। लागत निकालना मुश्किल हो रहा है और अगली फसल की तैयारी के लिए पूंजी की कमी साफ नजर आ रही है। अगर जल्द ही बाजार में सुधार नहीं हुआ तो किसानों को कर्ज लेकर खेती करनी पड़ सकती है। कुल मिलाकर, तीनों प्रमुख राज्यों में आलू की कीमतों में कमजोरी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अब किसानों को उम्मीद है कि सरकार और बाजार मिलकर कोई ऐसा समाधान निकालेंगे, जिससे उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।
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