कृषि समाचार

उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल पर सरकार चिंतित, सब्सिडी में बदलाव के संकेत

Imbalanced use of fertilizers

नई दिल्ली: भारतीय कृषि में तकनीक, उत्पादन और सरकारी योजनाओं के स्तर पर कई सुधारों के बावजूद खेती की उत्पादकता और किसानों की आय से जुड़ी बुनियादी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। आम बजट से पहले गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में सरकार ने उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल, खासकर यूरिया के अत्यधिक प्रयोग पर गंभीर चिंता जताई है।

यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि किसानों द्वारा यूरिया का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की सेहत, फसल उत्पादन और लंबे समय में खेती की टिकाऊ व्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसी को देखते हुए रिपोर्ट में यूरिया सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का सुझाव दिया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार, सरकार यूरिया की खुदरा कीमत में सीमित बढ़ोतरी पर विचार कर रही है।

2018 से स्थिर हैं यूरिया के दाम

फिलहाल यूरिया की कीमत मार्च 2018 से नहीं बढ़ी है और 45 किलो की एक बोरी 242 रुपये में उपलब्ध है। रिपोर्ट में प्रस्ताव दिया गया है कि यदि यूरिया की कीमत बढ़ाई जाती है, तो बढ़ी हुई राशि के बराबर पैसा किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जाए। इससे किसानों की कुल क्रय शक्ति पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन खाद के इस्तेमाल में सही आर्थिक संकेत मिलेंगे।

पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ा

सर्वेक्षण के मुताबिक, यूरिया सस्ता होने के कारण किसान नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा उपयोग कर रहे हैं, जबकि फास्फोरस और पोटाश जैसे अन्य पोषक तत्व महंगे हैं। इसके चलते खेती में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009-10 में N:P:K अनुपात 4:3.2:1 था, जो 2019-20 में 7:2.8:1 और 2023-24 में बढ़कर लगभग 10.9:4.1:1 तक पहुंच गया। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, अधिकतर फसलों के लिए आदर्श अनुपात करीब 4:2:1 होना चाहिए।

मिट्टी की गुणवत्ता पर असर

रिपोर्ट में बताया गया है कि यह समस्या उर्वरकों की कमी की नहीं, बल्कि उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन डालने से मिट्टी में ऑर्गेनिक मैटर घट रहा है, सूक्ष्म पोषक तत्व खत्म हो रहे हैं और मिट्टी की संरचना कमजोर हो रही है। साथ ही भूजल में नाइट्रेट का रिसाव भी बढ़ रहा है।

सरकार के अब तक के सुधार कदम

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि कई सिंचित क्षेत्रों में उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने के बावजूद फसल उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है। सरकार ने उर्वरक प्रबंधन सुधारने के लिए न्यूट्रिएंट बेस्ड प्राइसिंग, नीम कोटेड यूरिया, आधार से जुड़ा पॉइंट ऑफ सेल सिस्टम और इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम जैसे कदम उठाए हैं। इनसे निगरानी और पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन किसानों के खाद चयन के व्यवहार पर सीमित असर पड़ा है।

सब्सिडी को आय आधारित बनाने का सुझाव

इसी वजह से आर्थिक सर्वेक्षण में सिफारिश की गई है कि उर्वरक सब्सिडी को धीरे-धीरे इनपुट आधारित सहायता से आय आधारित सहायता में बदला जाए। प्रति एकड़ सीधे ट्रांसफर से संतुलित मात्रा में यूरिया इस्तेमाल करने वाले किसानों को लाभ मिलेगा, जबकि अधिक यूरिया डालने वालों को पोषक तत्व संतुलन की ओर जाने का संकेत मिलेगा।

फसल और क्षेत्र के अनुसार बनेगा मॉडल

रिपोर्ट में कहा गया है कि उर्वरकों की जरूरत फसल और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होती है। धान-गेहूं और गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में नाइट्रोजन की मांग अधिक होती है, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में दलहन और मोटे अनाज की खेती में कम। इसलिए ट्रांसफर को एग्रो क्लाइमेटिक जोन और फसल पैटर्न से जोड़ने की सिफारिश की गई है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, आधार से जुड़े उर्वरक बिक्री रिकॉर्ड, रियल टाइम ट्रैकिंग सिस्टम और पीएम किसान जैसे प्लेटफॉर्म इस बदलाव को लागू करने के लिए तैयार हैं, हालांकि बटाईदार खेती को लेकर पहले पायलट प्रोजेक्ट चलाने की जरूरत बताई गई है।

ये भी पढ़ें: दालों का आयात 30% तक घटने का अनुमान, भारत के लिए राहत के संकेत

Related posts

Leave a Comment