नई दिल्ली: देश में बढ़ती प्रोटीन की मांग और अंडे-चिकन की खपत ने पोल्ट्री उद्योग को एक नई रफ्तार दी है। खासकर अंडा उत्पादन के लिए मुर्गियों की पालन-पद्धति अब किसानों के लिए बेहतर आमदनी का जरिया बनती जा रही है। पोल्ट्री विशेषज्ञों के अनुसार, अंडों के लिए अलग नस्ल की मुर्गियों का चयन किया जाता है, और यह चयन पूरी तरह बाजार की मांग पर आधारित होता है। अंडे देने वाली मुर्गियां दो प्रमुख श्रेणियों में आती हैं – एक जो सफेद अंडे देती हैं और दूसरी जो ब्राउन अंडे। सफेद अंडे के लिए ईसा व्हाइट, लोहमैन व्हाइट और हाई सेक्स व्हाइट नस्लें प्रमुख हैं। वहीं, ब्राउन अंडों के लिए ईसा ब्राउन, लोहमैन ब्राउन और हाई लाइन ब्राउन नस्लें सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं।
पोल्ट्री एक्सपर्ट बताते हैं कि अंडा उत्पादन के लिए चूजों को पहले पांच से छह महीने तक विशेष देखभाल के साथ पाला जाता है। इस दौरान उनके खान-पान, पानी, केज की सफाई और रोशनी जैसी सभी चीजों का विशेष ख्याल रखना होता है। जब एक चूजा साढ़े चार से साढ़े पांच महीने की उम्र तक पहुंचता है, तब वह अंडा देना शुरू करता है और लगभग दो साल तक भरपूर उत्पादन देता है। एक मुर्गी 18 से 20 अंडे देने के लिए लगभग 2.2 किलोग्राम फीड खा जाती है। इसके बाद जब अंडा उत्पादन में गिरावट आने लगती है, तो मोल्टिंग प्रक्रिया द्वारा उसे फिर से कुछ हफ्तों के भीतर दोबारा अंडा देने योग्य बनाया जा सकता है।
मुर्गियों के रखरखाव में केज मैनेजमेंट एक अहम भूमिका निभाता है। केज में लगे हीटर, फीडर और ड्रिंकर की नियमित सफाई जरूरी होती है। चूजों को शुरुआत से ही स्टार्टर फीड दी जाती है और ब्रूडिंग खत्म होने तक इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मौसम के अनुसार तापमान और रोशनी की व्यवस्था करनी पड़ती है। अगर चूजे शोर मचा रहे हों, तो यह संकेत हो सकता है कि उन्हें कोई असुविधा है। चूजों की उम्र के अनुसार फीड और पानी की मात्रा भी सुनिश्चित की जाती है। मुर्गियां जितना फीड खाती हैं, उससे 1.5 से 2 गुना अधिक पानी पीती हैं। गर्मियों के मौसम में यह मात्रा और भी बढ़ जाती है, इसलिए केज में साफ पानी हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए। शुरुआती दिनों में फीड को कागज या कार्डबोर्ड पर रखकर खिलाना बेहतर रहता है, ताकि सभी चूजों को आसानी से खाना मिल सके।
साढ़े चार महीने की उम्र तक मुर्गी का वजन 1.4 से 1.55 किलोग्राम होना चाहिए। इस दौरान उनकी चोंच की ट्रिमिंग भी की जाती है। आमतौर पर 7 से 10 दिन की उम्र में ऊपरी और निचली चोंच के एक-तिहाई हिस्से को ट्रिम किया जाता है। ट्रिमिंग से पहले और बाद में विटामिन व इलेक्ट्रोलाइट्स देना जरूरी होता है ताकि तनाव और ब्लीडिंग को रोका जा सके। पोल्ट्री उद्योग अब न केवल शहरी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार का मजबूत जरिया बन रहा है। अंडा उत्पादन में वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। आवश्यकता है सिर्फ सही नस्ल, उचित देखभाल और समय पर जरूरी उपायों की जानकारी रखने की।
