पूसा: आम को फलों का राजा कहा जाता है, लेकिन अब इस पर जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडराने लगा है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बदलते मौसम के कारण आम के बागों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
मौसम में बदलाव से मंजर आने में देरी
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष आम के पेड़ों पर मंजर आने में सात से दस दिनों की देरी देखी गई है। इसका मुख्य कारण फरवरी महीने में कम तापमान और लंबा चला शीतकाल रहा। तापमान में इस असामान्य बदलाव ने पेड़ों के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है, जिससे फूल अधिक कोमल हो गए हैं और रोगों का खतरा बढ़ गया है।
कीटों का बढ़ता खतरा और फसल पर असर
आम के बागों में इस समय दो तरह की स्थिति देखने को मिल रही है। जहां देखभाल बेहतर हुई है, वहां छोटे फल विकसित हो रहे हैं, जबकि अन्य जगहों पर मिली बग जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ गया है। यह कीट मंजर और फलों का रस चूसकर उन्हें गिरा देता है और पेड़ों को कमजोर बना देता है। इसके कारण उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
पुराने पेड़ों पर ज्यादा असर
वैज्ञानिकों के अध्ययन में सामने आया है कि पंद्रह वर्ष से अधिक पुराने पेड़ मौसम के बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें फूल आने में देरी और उत्पादन में कमी देखी जा रही है, जबकि युवा पेड़ अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
भविष्य में बढ़ सकता है संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में तापमान में और वृद्धि हो सकती है, जिससे परागण प्रक्रिया प्रभावित होगी। परागण करने वाले कीटों की संख्या घटने से फल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है, जिससे आम की पैदावार पर गंभीर असर पड़ेगा।
किसानों के लिए जरूरी उपाय
विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे समय रहते वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएं। कीट नियंत्रण के लिए पेड़ों के तनों पर अवरोध लगाना, संतुलित खाद का उपयोग करना और उचित सिंचाई व्यवस्था अपनाना जरूरी है। इसके अलावा बागों की नियमित निगरानी और साफ-सफाई भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
आम की खेती अब केवल पारंपरिक तरीका नहीं रह गई है, बल्कि इसमें वैज्ञानिक समझ और आधुनिक तकनीकों का उपयोग जरूरी हो गया है। यदि किसान समय रहते इन बदलावों को अपनाते हैं, तो वे इस चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं और भविष्य में भी अच्छी पैदावार सुनिश्चित कर सकते हैं।
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