पशुपालन

सर्दियों में नवजात बछड़ों की सही खुराक और ठंड से बचाव के जरूरी

Caring for Newborn Calves in Winter

नई दिल्ली: सर्दियों का मौसम नवजात बछड़ों के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान पशुपालकों के सामने दो बड़ी चुनौतियां होती हैं बछड़ों को ठंड से सुरक्षित रखना और उनकी उम्र व मौसम के अनुसार सही खुराक देना। पशु विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के शुरुआती दिनों में की गई छोटी-सी लापरवाही भी बछड़ों को बीमार कर सकती है और कई मामलों में उनकी मौत तक हो जाती है।

सर्दियों में बछड़ों की मृत्यु दर क्यों बढ़ जाती है

सर्दियों के मौसम में गाय-भैंस का प्रजनन अधिक होता है, जिससे बड़ी संख्या में बछड़े जन्म लेते हैं। लेकिन ठंड के कारण नवजात बछड़े जल्दी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि जन्म से तीन महीने की उम्र के बीच बछड़ों की करीब 32 से 35 प्रतिशत तक मृत्यु हो जाती है। यही वजह है कि ठंड में बाड़े की व्यवस्था, तापमान नियंत्रण और पोषण पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है।

जन्म के साथ ही शुरू होता है बछड़े का पाचन तंत्र विकास

बछड़े के जन्म के साथ ही उसका रूमेन यानी पेट विकसित होना शुरू हो जाता है। शुरुआती दिनों में बछड़ा धीरे-धीरे रेशेदार आहार को पचाने की क्षमता विकसित करता है। उम्र के साथ-साथ उसके भोजन में बदलाव करना जरूरी होता है, ताकि उसकी ग्रोथ और इम्युनिटी मजबूत बनी रहे।

तीन महीने बाद क्यों जरूरी है रेशेदार चारा

करीब तीन महीने की उम्र में बछड़ा हरा और रेशेदार चारा खाने लगता है। रेशेदार चारा बछड़े के रखरखाव और शारीरिक विकास में अहम भूमिका निभाता है। इससे ठंड के तनाव को सहने के लिए जरूरी ऊर्जा मिलती है और शरीर का तापमान बनाए रखने में मदद मिलती है।

मोटा चारा सर्दियों में क्यों फायदेमंद है

ज्यादातर पशु मोटे और रेशेदार चारे को पसंद करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मोटा चारा पाचन प्रक्रिया के दौरान अधिक गर्मी पैदा करता है। यह गर्मी सर्दियों में शरीर को ठंड से बचाने में सहायक होती है, जिससे बछड़े ज्यादा स्वस्थ रहते हैं।

उम्र के अनुसार कितना खिलाना है सही

पशु विशेषज्ञों के अनुसार, बछड़े का पेट लगभग छह महीने की उम्र तक पूरी तरह विकसित हो जाता है। आमतौर पर पशु अपने शरीर के वजन का करीब 2.5 प्रतिशत ही भोजन करते हैं। सर्दियों में पुआल, उपलब्ध हरी घास के साथ संतुलित मात्रा में कंसंट्रेट और गुणवत्तापूर्ण चारा देना चाहिए। साथ ही चारे की नियमित सप्लाई बनाए रखना बेहद जरूरी है।

कंसंट्रेट देते समय इन बातों का रखें ध्यान

अगर चारे की सप्लाई सीमित है, तो कंसंट्रेट की गुणवत्ता और मात्रा में बदलाव किया जा सकता है। अनाज या कंसंट्रेट एक साथ ज्यादा मात्रा में देने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार देना बेहतर रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कंसंट्रेट की मात्रा हर हफ्ते 50 से 100 ग्राम तक बढ़ाई जा सकती है। एक साथ ज्यादा खिलाने से एसिडोसिस की समस्या हो सकती है।

बछड़ों की देखभाल में जरूरी अन्य सावधानियां

अगर बछड़े में अतिरिक्त थन हों, तो उन्हें शुरुआती अवस्था में ही निकलवा देना चाहिए। कमजोर या बहुत दुबले-पतले जानवर ठंड को आसानी से सहन नहीं कर पाते, इसलिए उनके पोषण और देखभाल पर खास ध्यान देना जरूरी है। संतुलित आहार, साफ-सुथरा और ठंड से सुरक्षित बाड़ा बछड़ों को बीमारियों से बचाने में मदद करता है।

सही देखभाल से कम होगी बछड़ों की मौत

कुल मिलाकर, सर्दियों में बछड़ों की उम्र के अनुसार सही खुराक और बेहतर देखभाल से न केवल उनकी मृत्यु दर को कम किया जा सकता है, बल्कि भविष्य में स्वस्थ और अधिक उत्पादन देने वाले पशु भी तैयार किए जा सकते हैं। यह पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में भी एक अहम कदम साबित हो सकता है।

सर्दियों का मौसम नवजात बछड़ों के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान पशुपालकों के सामने दो बड़ी चुनौतियां होती हैं बछड़ों को ठंड से सुरक्षित रखना और उनकी उम्र व मौसम के अनुसार सही खुराक देना। पशु विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के शुरुआती दिनों में की गई छोटी-सी लापरवाही भी बछड़ों को बीमार कर सकती है और कई मामलों में उनकी मौत तक हो जाती है।

सर्दियों में बछड़ों की मृत्यु दर क्यों बढ़ जाती है

सर्दियों के मौसम में गाय-भैंस का प्रजनन अधिक होता है, जिससे बड़ी संख्या में बछड़े जन्म लेते हैं। लेकिन ठंड के कारण नवजात बछड़े जल्दी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि जन्म से तीन महीने की उम्र के बीच बछड़ों की करीब 32 से 35 प्रतिशत तक मृत्यु हो जाती है। यही वजह है कि ठंड में बाड़े की व्यवस्था, तापमान नियंत्रण और पोषण पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है।

जन्म के साथ ही शुरू होता है बछड़े का पाचन तंत्र विकास

बछड़े के जन्म के साथ ही उसका रूमेन यानी पेट विकसित होना शुरू हो जाता है। शुरुआती दिनों में बछड़ा धीरे-धीरे रेशेदार आहार को पचाने की क्षमता विकसित करता है। उम्र के साथ-साथ उसके भोजन में बदलाव करना जरूरी होता है, ताकि उसकी ग्रोथ और इम्युनिटी मजबूत बनी रहे।

तीन महीने बाद क्यों जरूरी है रेशेदार चारा

करीब तीन महीने की उम्र में बछड़ा हरा और रेशेदार चारा खाने लगता है। रेशेदार चारा बछड़े के रखरखाव और शारीरिक विकास में अहम भूमिका निभाता है। इससे ठंड के तनाव को सहने के लिए जरूरी ऊर्जा मिलती है और शरीर का तापमान बनाए रखने में मदद मिलती है।

मोटा चारा सर्दियों में क्यों फायदेमंद है

ज्यादातर पशु मोटे और रेशेदार चारे को पसंद करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मोटा चारा पाचन प्रक्रिया के दौरान अधिक गर्मी पैदा करता है। यह गर्मी सर्दियों में शरीर को ठंड से बचाने में सहायक होती है, जिससे बछड़े ज्यादा स्वस्थ रहते हैं।

उम्र के अनुसार कितना खिलाना है सही

पशु विशेषज्ञों के अनुसार, बछड़े का पेट लगभग छह महीने की उम्र तक पूरी तरह विकसित हो जाता है। आमतौर पर पशु अपने शरीर के वजन का करीब 2.5 प्रतिशत ही भोजन करते हैं। सर्दियों में पुआल, उपलब्ध हरी घास के साथ संतुलित मात्रा में कंसंट्रेट और गुणवत्तापूर्ण चारा देना चाहिए। साथ ही चारे की नियमित सप्लाई बनाए रखना बेहद जरूरी है।

कंसंट्रेट देते समय इन बातों का रखें ध्यान

अगर चारे की सप्लाई सीमित है, तो कंसंट्रेट की गुणवत्ता और मात्रा में बदलाव किया जा सकता है। अनाज या कंसंट्रेट एक साथ ज्यादा मात्रा में देने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार देना बेहतर रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कंसंट्रेट की मात्रा हर हफ्ते 50 से 100 ग्राम तक बढ़ाई जा सकती है। एक साथ ज्यादा खिलाने से एसिडोसिस की समस्या हो सकती है।

बछड़ों की देखभाल में जरूरी अन्य सावधानियां

अगर बछड़े में अतिरिक्त थन हों, तो उन्हें शुरुआती अवस्था में ही निकलवा देना चाहिए। कमजोर या बहुत दुबले-पतले जानवर ठंड को आसानी से सहन नहीं कर पाते, इसलिए उनके पोषण और देखभाल पर खास ध्यान देना जरूरी है। संतुलित आहार, साफ-सुथरा और ठंड से सुरक्षित बाड़ा बछड़ों को बीमारियों से बचाने में मदद करता है।

सही देखभाल से कम होगी बछड़ों की मौत

कुल मिलाकर, सर्दियों में बछड़ों की उम्र के अनुसार सही खुराक और बेहतर देखभाल से न केवल उनकी मृत्यु दर को कम किया जा सकता है, बल्कि भविष्य में स्वस्थ और अधिक उत्पादन देने वाले पशु भी तैयार किए जा सकते हैं। यह पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में भी एक अहम कदम साबित हो सकता है।

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