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गेहूं की बालियों में कालापन बढ़ा, करनाल बंट रोग से भारी नुकसान का खतरा

Blackening of wheat

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में गेहूं की बालियों में कालापन दिखाई देने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह लक्षण करनाल बंट (Karnal Bunt) नामक खतरनाक फफूंदजनित बीमारी का संकेत हो सकता है। यह रोग दानों को काला कर देता है और उनसे सड़ी मछली जैसी तीखी गंध आने लगती है। समय पर रोकथाम न होने पर यह बीमारी उपज और गुणवत्ता दोनों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।

क्या है करनाल बंट रोग।

गेहूं की बालियों में कालापन या करनाल बंट टिलेशिया इंडिका नामक फफूंद के कारण होने वाला रोग है। यह मुख्य रूप से बीज और मिट्टी के माध्यम से फैलता है। नम मौसम, बादल, हल्की बारिश और मध्यम तापमान की स्थिति में यह तेजी से पनपता है।

रोग के प्रमुख लक्षण।

इस रोग में गेहूं के दाने आंशिक रूप से काले और चूर्ण जैसे हो जाते हैं। संक्रमित दानों से सड़ी मछली जैसी गंध आती है। अधिकतर मामलों में यह रोग कटाई और थ्रेसिंग के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। दाने पूरी तरह नहीं भरते और उनका अंदरूनी हिस्सा काले पाउडर में बदल जाता है।

किन परिस्थितियों में बढ़ता है खतरा।

फूल आने की अवस्था में यदि तापमान 8 से 23 डिग्री सेल्सियस के बीच रहे और आर्द्रता अधिक हो तो करनाल बंट का प्रकोप बढ़ जाता है। लगातार कई वर्षों तक एक ही खेत में गेहूं की खेती करने से भी बीमारी का खतरा बढ़ता है।

बीज और मिट्टी से जुड़ी सावधानियां।

किसानों को प्रमाणित और रोगमुक्त बीजों का ही उपयोग करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशक से उपचार करना अनिवार्य है। खेत की मिट्टी की जांच कराकर आवश्यक सुधारात्मक उपाय अपनाना भी जरूरी है।

फसल चक्र और एकीकृत प्रबंधन।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि खेत में पांच वर्ष तक गैर-मेजबान फसलों का फसल चक्र अपनाने से इस रोग के बीजाणुओं की संख्या घटाई जा सकती है। इसके साथ संतुलित उर्वरक उपयोग और समय पर निराई-गुड़ाई भी सहायक होती है।

रासायनिक नियंत्रण के उपाय।

बाली निकलने की अवस्था में प्रति एकड़ 200 मिली प्रोपिकोनाजोल (Propiconazole 25% EC) को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यह उपाय रोग के प्रसार को रोकने में प्रभावी माना जाता है।

सिंचाई प्रबंधन पर विशेष ध्यान।

फूल आने के समय खेत में अत्यधिक नमी न रहने दें। जलभराव की स्थिति से बचें और जरूरत पड़ने पर पानी की निकासी की व्यवस्था करें। इससे करनाल बंट रोग के फैलने की संभावना काफी कम हो जाएगी।

कितना हो सकता है आर्थिक नुकसान।

करनाल बंट रोग के कारण गेहूं की उपज में 40 से 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इसके अलावा अनाज की गुणवत्ता खराब होने से बाजार में कम दाम मिलते हैं। यह एक क्वारंटाइन रोग भी है, जिससे गेहूं के निर्यात पर रोक लग सकती है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे फसल की नियमित निगरानी करें और लक्षण दिखते ही विशेषज्ञों से सलाह लेकर उचित उपचार अपनाएं। इससे समय रहते नुकसान से बचा जा सकता है।

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