नई दिल्ली: भारत की कृषि व्यवस्था में मक्का एक बहुउपयोगी और रणनीतिक फसल मानी जाती है, जिसका इस्तेमाल भोजन, पशु आहार और उद्योगों में बड़े पैमाने पर होता है. भारतीय कृषि को भविष्य के लिए और मजबूत बनाने की दिशा में 4 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में एक अहम पहल की गई. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मक्का की 50 नई उन्नत किस्में जारी कीं, जो बदलती जलवायु, बढ़ती पोषण जरूरतों और किसानों की आय बढ़ाने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं. इनमें से 10 किस्में विशेष रूप से बायोफोर्टिफाइड हैं, जिन्हें भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (IIMR), लुधियाना ने विकसित किया है. इन किस्मों को ‘लैब टू लैंड’ रणनीति के तहत तैयार किया गया है, ताकि वैज्ञानिक शोध का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचे.
बदलती जलवायु के अनुसार तैयार की गई नई मक्का किस्में
नई मक्का किस्मों को उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत, पहाड़ी और पूर्वी क्षेत्रों की कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. इन किस्मों की खास बात यह है कि ये न केवल अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं, बल्कि मौसम की अनिश्चितताओं का भी बेहतर तरीके से सामना कर सकती हैं. साथ ही इनमें आयरन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा अधिक है, जिससे आम लोगों की थाली भी ज्यादा पोषणयुक्त बनेगी.
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए पोषण से भरपूर मक्का
आईआईएमआर, लुधियाना द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों के लिए ICQMH 209 किस्म विकसित की गई है. यह खरीफ मौसम में 7.40 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज देने में सक्षम है. वहीं उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों के लिए IQMH 210 किस्म लाई गई है, जिससे 8.50 टन प्रति हेक्टेयर तक बंपर पैदावार मिल सकती है. इन दोनों किस्मों में आयरन और जिंक की भरपूर मात्रा मौजूद है, जो किसानों की आय के साथ-साथ उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाएगी.
उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्र के लिए चार बायोफोर्टिफाइड किस्में
उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्र के लिए आईआईएमआर, लुधियाना ने चार नई बायोफोर्टिफाइड किस्में जारी की हैं. IQMH 206 किस्म 5.76 टन प्रति हेक्टेयर की उपज देती है और इसमें आयरन-जिंक की मात्रा अधिक है. IQMH 207 किस्म 6.90 टन की स्थिर उपज और बेहतर पोषण के लिए जानी जाती है. इसके अलावा IQMH 211 और IQMH 212 किस्में भी अधिसूचित की गई हैं, जो क्रमशः 7.10 टन प्रति हेक्टेयर की उपज देती हैं और दाना गुणवत्ता के साथ पोषण सुरक्षा को मजबूत करती हैं.
मध्य पश्चिमी क्षेत्र में किसानों को मिलेगा अधिक मुनाफा
मध्य पश्चिमी क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए तीन प्रमुख बायोफोर्टिफाइड किस्में उपलब्ध कराई गई हैं. IQMH 208 किस्म 6.79 टन प्रति हेक्टेयर की उपज के साथ उच्च पोषण प्रदान करती है. IQMH 211 इस क्षेत्र में भी सफल साबित हुई है, जो 7.10 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार देती है. वहीं IQMH 213 किस्म 7.14 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन क्षमता और मजबूत पौध संरचना के कारण किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है.
मैदानी क्षेत्रों के लिए उच्च उत्पादन वाली नई किस्म
मैदानी इलाकों के लिए विशेष रूप से IQMH 214 किस्म विकसित की गई है. यह खरीफ मौसम में 8.66 टन प्रति हेक्टेयर तक की शानदार उपज देती है. आयरन और जिंक से भरपूर यह किस्म व्यावसायिक खेती के साथ-साथ घरेलू उपभोग के लिए भी बेहद उपयोगी मानी जा रही है.
बायोफोर्टिफाइड मक्का क्यों है जरूरी
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार आज खेती का लक्ष्य सिर्फ पेट भरना नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है. बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक के जरिए फसलों में प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है. भारत में महिलाओं और बच्चों में आयरन की कमी और कुपोषण एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में आयरन और जिंक युक्त मक्का इन समस्याओं से निपटने का सस्ता, टिकाऊ और प्रभावी समाधान बन सकता है.
किसानों के लिए कैसे फायदेमंद हैं ये किस्में
इन नई मक्का किस्मों की उत्पादन क्षमता 7 से 8.5 टन प्रति हेक्टेयर तक है, जिससे किसानों की कुल पैदावार और आय में सीधा इजाफा होगा. पोषणयुक्त दानों के कारण बाजार में इन किस्मों की मांग सामान्य मक्का की तुलना में अधिक रहने की संभावना है. साथ ही ये किस्में रोग सहनशील हैं, जिससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है. कुल मिलाकर, ये नई बायोफोर्टिफाइड मक्का किस्में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और देश की पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगी.
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