खेती-किसानी

उड़द और मूंग की फसल पर मंडरा रहा पीला मोजेक रोग का खतरा, किसान रहें सतर्क

देश के कई हिस्सों में खरीफ फसलों की बुवाई जून महीने में ही पूरी कर ली गई थी, जिससे अब तक फसलों में अच्छी बढ़वार देखने को मिल रही है। लेकिन इस बार मॉनसून की अनियमितता किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर सकती है। दरअसल, लगातार बारिश के बजाय बीच-बीच में रुक-रुक कर हो रही बारिश ने फसलों को बीमारियों के खतरे में डाल दिया है, खासकर दलहनी फसलों के लिए यह स्थिति गंभीर बनती जा रही है। उड़द और मूंग की फसलों में इन दिनों पीला मोजेक रोग (Yellow Mosaic Virus) का प्रकोप तेजी से फैल रहा है, जिससे उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

पीला मोजेक रोग सफेद मक्खी जैसे कीटों के माध्यम से फैलता है और यह फसल की पत्तियों को पूरी तरह से पीला कर देता है। शुरुआत में पत्तियों पर पीले धब्बे नजर आते हैं जो धीरे-धीरे पूरे पौधे को अपनी चपेट में ले लेते हैं। इस बीमारी के कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है, वे मुरझा जाते हैं और अंत में उपज की गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों प्रभावित होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी आमतौर पर रोगग्रस्त बीजों से या सफेद मक्खी के संक्रमण से फैलती है। ऐसे में खेतों की सतत निगरानी जरूरी हो जाती है ताकि लक्षणों को शुरुआती अवस्था में ही पहचाना जा सके। लक्षणों में मुख्य रूप से पत्तियों का पीला पड़ना, खुरदरा होना, सिकुड़न आना और पौधों का कमजोर पड़ना शामिल है।

रोकथाम के लिए सबसे पहले पीड़ित पौधों को पहचानकर उन्हें खेत से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। इन पौधों को खेत के बाहर या गड्ढा खोदकर मिट्टी में दबा देना चाहिए ताकि रोग का प्रसार रोका जा सके। इसके साथ ही जैविक उपायों की बात करें तो नीम का तेल काफी असरदार साबित होता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 10 हजार PPM का नीम का तेल और दो सामान्य शैम्पू को एक-एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर 10 दिन पर तीन बार दोहराने से रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि रोग का प्रकोप बढ़ जाए तो कीटनाशकों का सहारा लेना पड़ सकता है। डाइमेथोएट और मेटासिस्टॉक्स जैसे कीटनाशकों की 500-600 मिली मात्रा को पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा थायोमेथोक्साम दवा की 100 ग्राम मात्रा को भी 500-600 लीटर पानी में घोलकर उपयोग में लाया जा सकता है। इस तरह के रसायनों का छिड़काव हर 15 दिन पर किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही बीजों की गुणवत्ता भी इस रोग को रोकने में बड़ी भूमिका निभाती है। किसान यदि रोग रोधी किस्मों का चयन करें और बुवाई से पूर्व बीजों का उपचार करें, तो इस रोग का खतरा काफी हद तक टल सकता है। जानकारों का मानना है कि जैविक और घरेलू उपाय सिर्फ सस्ते ही नहीं होते, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी बनाए रखते हैं। लंबे समय में जैविक पद्धतियों को अपनाने से कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है और फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। इसलिए यदि उड़द और मूंग की फसल पर पीला मोजेक रोग के लक्षण नजर आने लगें तो तुरंत कार्रवाई करें और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने में देर न करें। समय रहते उठाए गए कदम ही फसल और किसान दोनों को बचा सकते हैं।

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