नई दिल्ली: भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए किसानों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल वित्तीय बोझ का हवाला देकर मुआवजे में कटौती नहीं की जा सकती और न्यायसंगत मुआवजा देना संवैधानिक अधिकार है।
मुआवजे पर सरकार का तर्क खारिज
अदालत के सामने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने पहले के फैसले की समीक्षा की मांग की थी, जिसमें दो हजार तेरह से पहले अधिग्रहित जमीन के लिए अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। सरकार का कहना था कि इससे हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
सोलेशियम और ब्याज का अधिकार बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि मालिक कानून के अनुसार सोलेशियम और ब्याज पाने के हकदार हैं। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले से निपटाए जा चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता। इससे न्यायिक प्रक्रिया में स्थिरता बनी रहेगी।
किन मामलों को मिलेगा लाभ
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल वही मामले इस फैसले का लाभ उठा सकेंगे, जो अट्ठाईस मार्च दो हजार पंद्रह तक संबंधित मंचों पर लंबित थे। ऐसे मामलों में कानून के अनुसार उचित राहत दी जाएगी। जिन लोगों ने पहले ही मुआवजा लेकर मामला समाप्त कर लिया है, वे इस फैसले के तहत दावा नहीं कर सकेंगे।
लंबित मामलों पर ही लागू होगा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े पुराने और बंद मामलों को फिर से नहीं खोला जाएगा। केवल लंबित मामलों में ही सोलेशियम और ब्याज का लाभ मिलेगा। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी पर रोक लगेगी और स्पष्टता बनी रहेगी।
किसानों के अधिकारों की पुष्टि
इस फैसले को किसानों और भूमि मालिकों के अधिकारों की सुरक्षा के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने दोहराया कि मुआवजा देना सरकार की जिम्मेदारी है और वित्तीय दबाव को इसका आधार नहीं बनाया जा सकता। कुल मिलाकर यह निर्णय भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों के लिए राहत भरा है और यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें उनके अधिकारों के अनुसार उचित मुआवजा मिले।
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