खेती-किसानी

गन्ने की पेड़ी से कम लागत में होगा ज्यादा मुनाफा, सही तकनीक बढ़ाएगी उपज

sugarcane plant

नई दिल्ली: गन्ने की खेती में लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए गन्ने की पेड़ी (Ratoon Crop) किसानों के लिए एक कारगर विकल्प बनकर उभर रही है। मुख्य फसल की कटाई के बाद खेत में बचे ठूंठों से दोबारा फसल लेना पेड़ी कहलाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पेड़ी की खेती में न तो नई बुवाई का खर्च आता है और न ही खेत की दोबारा तैयारी करनी पड़ती है। यही वजह है कि पेड़ी की लागत मुख्य फसल की तुलना में करीब 25 से 30 प्रतिशत तक कम होती है, जबकि सही प्रबंधन से पैदावार बराबर या उससे अधिक भी मिल सकती है।

किस्म का सही चयन है सफलता की कुंजी

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पेड़ी की सफलता काफी हद तक गन्ने की किस्म पर निर्भर करती है। इसलिए वही किस्म पेड़ी के लिए चुननी चाहिए, जिसे विशेषज्ञों द्वारा अनुमोदित किया गया हो। कमजोर या अनुपयुक्त किस्म से ली गई पेड़ी में उत्पादन घटने का खतरा रहता है।

कटाई और स्टबल शेविंग पर दें विशेष ध्यान

पेड़ी के लिए मुख्य फसल की कटाई के समय धारदार औजारों का उपयोग जरूरी है, ताकि ठूंठ जमीन की सतह के बराबर कटें। इससे नीचे मौजूद कलिकाओं को फूटने में आसानी होती है और जड़ें गहराई तक जाती हैं। कटाई के तुरंत बाद स्टबल शेविंग यानी ठूंठों की छंटाई करना बेहद जरूरी माना जाता है। इससे पुरानी और बेकार कलिकाएं हट जाती हैं और नई, स्वस्थ कलिकाओं का विकास तेजी से होता है।

खाली जगह भरना है जरूरी

कटाई के दौरान मजदूरों या मशीनों की आवाजाही से खेत में कई जगह खाली रह जाती हैं। इन खाली स्थानों को भरने के लिए पॉलीबैग में तैयार 35–40 दिन पुराने पौधों का उपयोग करना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, समय पर गैप फिलिंग करने से पेड़ी की उपज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी जाती है।

खाद और सिंचाई का वैज्ञानिक प्रबंधन

पेड़ी की फसल को मुख्य फसल की तुलना में अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक सिफारिश के अनुसार प्रति एकड़ लगभग 3 बैग यूरिया, 5 बैग सुपर फास्फेट और 1.5 बैग पोटाश का उपयोग करना चाहिए। इसके साथ एज़ोस्पिरीलम और फास्फोबैक्टर जैसे जैव-उर्वरक मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करते हैं। सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति सबसे बेहतर मानी जाती है, जबकि विकल्प के रूप में एकांतर कूड़ विधि अपनाई जा सकती है।

पत्तियां न जलाएं, मल्चिंग से मिलेगा फायदा

कृषि विशेषज्ञ गन्ने की सूखी पत्तियों को जलाने से मना करते हैं। इन्हें कतारों के बीच बिछाने से मिट्टी में नमी बनी रहती है, खरपतवार कम उगते हैं और बाद में यही पत्तियां सड़कर जैविक खाद बन जाती हैं। इससे मिट्टी को नाइट्रोजन और पोटाश भी मिलता है। पेड़ी शुरू होने के 1, 4 और 7 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई जरूरी बताई जाती है। मजदूरों की कमी होने पर वैज्ञानिक सलाह से एट्राजीन का छिड़काव किया जा सकता है।

सहफसली खेती से अतिरिक्त आमदनी

पेड़ी की कतारों के बीच खाली जगह में मूंग, उड़द या फ्रेंच बीन जैसी सब्जियों की खेती कर किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है। श्रम की समस्या से निपटने के लिए ICAR-IISR द्वारा विकसित आर.एम.डी. मशीन उपयोगी मानी जा रही है, जो एक साथ ठूंठ छंटाई, खाद डालने और मिट्टी चढ़ाने का काम करती है।

समय से पहले तैयार होती है पेड़ी

विशेषज्ञों के अनुसार पेड़ी की फसल मुख्य फसल की तुलना में लगभग एक महीने पहले कटाई के लिए तैयार हो जाती है। सही किस्म, वैज्ञानिक तकनीक और समय पर प्रबंधन अपनाकर किसान पेड़ी से कम लागत में ज्यादा और बेहतर गुणवत्ता की पैदावार हासिल कर सकते हैं।

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