कृषि समाचार

राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय की ‘राजेंद्र सोनिया’ हल्दी की पूरे देश में भारी मांग, किसानों की आय में हो रही बढ़ोतरी

समस्तीपुर: राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) द्वारा विकसित हल्दी की उन्नत किस्म ‘राजेंद्र सोनिया’ देशभर में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इस किस्म की खासियत इसमें पाए जाने वाले कुर्कुमिन तत्व की उच्च मात्रा है, जो इसे अन्य सामान्य हल्दी किस्मों से कहीं अधिक प्रभावशाली बनाती है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा की गई वैज्ञानिक परीक्षण और वर्गीकरण प्रक्रिया में इस हल्दी में कुर्कुमिन की मात्रा 6 प्रतिशत से 8.5 प्रतिशत तक पाई गई है। कुर्कुमिन एक ऐसा जैव सक्रिय यौगिक है, जो अपने एंटीऑक्सीडेंट, सूजनरोधी और कैंसर-प्रतिरोधी गुणों के लिए जाना जाता है।

राजेंद्र सोनिया किस्म की गुणवत्ता की वैज्ञानिक पुष्टि विश्वविद्यालय के कुलपति के निर्देश पर की गई, जिसके बाद यह किस्म न केवल प्रमाणित हुई, बल्कि इसकी मांग सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों से लेकर आम किसानों तक में तेज़ी से बढ़ी है। देश के कई राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की संस्थाओं ने 2025 के खरीफ सीजन के लिए विश्वविद्यालय से 347 क्विंटल से अधिक राजेंद्र सोनिया हल्दी की खरीद की है। बिहार के किसानों को भी इस किस्म की 130 क्विंटल बीज सामग्री प्रदान की गई है, ताकि वे इसका उत्पादन कर बाज़ार में बढ़ती मांग का लाभ उठा सकें।

विशेषज्ञों का कहना है कि राजेंद्र सोनिया की लोकप्रियता के पीछे इसका औषधीय महत्व है। कुर्कुमिन की अधिकता इसे न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर बनाती है, बल्कि औषधि, प्रसंस्करण और निर्यात क्षेत्र में भी इसकी मांग बढ़ाती है। यही कारण है कि किसान इस किस्म की खेती को लेकर अधिक उत्साहित हैं, क्योंकि इससे उन्हें पारंपरिक हल्दी की तुलना में बेहतर कीमत मिल रही है। समस्तीपुर जैसे जिलों में जहां पहले से हल्दी की खेती होती रही है, वहां राजेंद्र सोनिया ने एक नई संभावनाओं की राह खोली है। अब किसान उच्च गुणवत्ता वाली हल्दी बेचकर अपनी आमदनी में इजाफा कर पा रहे हैं। विश्वविद्यालय का मानना है कि इस प्रकार की प्रजातियों के विकास से कृषि क्षेत्र में नवाचार और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है।

साथ ही विश्वविद्यालय अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी जीआई टैगिंग की दिशा में काम कर रहा है। जैसे कि मोतिहारी के मर्चा धान के चूड़े को जीआई टैग मिलने के बाद उसका बाजार मूल्य दोगुना हो गया, जिससे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला। अब शाही लीची (शहद) के लिए भी जीआई टैग की प्रक्रिया जारी है, जिससे मधुमक्खी पालन से जुड़े किसानों की आमदनी में भी संभावित बढ़ोतरी देखी जा सकती है। राजेंद्र सोनिया के माध्यम से राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने यह साबित किया है कि वैज्ञानिक शोध, स्थानीय कृषि की समझ और व्यावहारिक दृष्टिकोण के संयोजन से कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव हैं। आने वाले समय में इस तरह की उन्नत किस्मों की मांग और भी बढ़ने की संभावना है, जिससे देशभर के किसान लाभान्वित हो सकें।

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