नई दिल्ली: बजट सत्र में केंद्र सरकार नया बीज बिल पेश कर सकती है, लेकिन इस प्रस्तावित कानून को लेकर किसानों से लेकर कृषि विशेषज्ञों तक के बीच गंभीर चिंताएं उभर रही हैं. दशकों से भारतीय किसान अपनी फसल के बीज खुद बचाते और अगली बुवाई में इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन नए बीज विधेयक में ऐसे प्रावधान बताए जा रहे हैं, जो इस पारंपरिक व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं. खास तौर पर विदेशी कंपनियों को दी जाने वाली छूट और घरेलू छोटे बीज उत्पादकों पर सख्ती को लेकर विरोध तेज हो गया है. कई संगठनों का मानना है कि यह बिल भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए नया संकट पैदा कर सकता है.
संयुक्त किसान मोर्चा ने किया विरोध का ऐलान
नए बीज बिल के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. मोर्चा ने 16 जनवरी को ‘प्रतिरोध दिवस’ मनाने का फैसला किया है. अपने बयान में संगठन ने कहा है कि यह बिल किसानों के हितों की अनदेखी करता है और बीज बाजार को बड़ी विदेशी कंपनियों के हवाले करने की राह खोलता है. मोर्चा के अनुसार, प्रस्तावित कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो किसानों की स्वायत्तता और पारंपरिक बीज प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
बिना रजिस्ट्रेशन बीज बिक्री पर रोक
प्रस्तावित कानून के तहत बिना सरकारी रजिस्ट्रेशन किसी भी बीज या पौधे की बिक्री अवैध मानी जाएगी. नियमों का उल्लंघन करने पर जेल या भारी जुर्माने का प्रावधान हो सकता है. किसानों, छोटे बीज विक्रेताओं और नर्सरी संचालकों का कहना है कि इससे उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी. किसानों की मूल जरूरत है समय पर, सस्ती कीमत पर और अच्छी उपज देने वाले बीज, लेकिन विधेयक में इन बुनियादी सवालों पर स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखते.
विदेशी बीजों को विशेष छूट पर सवाल
नए बीज बिल में विदेशी बीजों को लेकर नियम अपेक्षाकृत ढीले बताए जा रहे हैं. इसके तहत आयातित बीजों की भारत में अनिवार्य जांच नहीं होगी और कंपनियों के स्वयं के प्रमाणीकरण को ही मान्यता दी जा सकती है. इसके अलावा सरकार बीज की कीमतों में हस्तक्षेप नहीं करेगी. नकली बीज या धोखाधड़ी के मामलों में भी केवल केंद्रीय बीज निरीक्षक की शिकायत पर ही कानूनी कार्रवाई संभव होगी. किसानों को डर है कि इससे विदेशी कंपनियों को अनुचित फायदा मिलेगा और घरेलू बाजार में उनकी पकड़ मजबूत हो जाएगी.
खेती और किसानों पर संभावित असर
किसान संगठनों का तर्क है कि इतिहास में विदेशी बीजों के अनुभव हमेशा सकारात्मक नहीं रहे हैं. 1960 के दशक में आई विदेशी गेहूं और धान की किस्मों से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन खेती की लागत, कर्ज और पानी की खपत भी तेजी से बढ़ी. बीटी कपास के मामले में कीट प्रकोप और बढ़ती लागत ने कई किसानों को कर्ज के जाल में फंसा दिया. अब आशंका जताई जा रही है कि जीएम और अन्य विदेशी बीजों के आने से सरकारी बीज संस्थान कमजोर होंगे और देशी व पारंपरिक किस्में खतरे में पड़ जाएंगी. इलाहाबादी अमरूद, मलिहाबादी आम और बनारसी लंगड़ा जैसी स्थानीय किस्मों के अस्तित्व पर भी संकट आ सकता है.
किसानों की मुख्य मांगें
किसानों का कहना है कि उन्हें किसी भी नई नीति से पहले तीन बुनियादी बातों की गारंटी चाहिए: समय पर बीज की उपलब्धता, सस्ती कीमत और भरोसेमंद उत्पादन. लेकिन नए बीज विधेयक में इन मुद्दों पर स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया है. इसी वजह से किसानों के बीच आशंका है कि आने वाले समय में उन्हें अच्छे और किफायती बीज मिलना और मुश्किल हो सकता है.
कुल मिलाकर, नया बीज बिल खेती के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. किसान संगठनों की मांग है कि सरकार इसे लागू करने से पहले व्यापक चर्चा करे और ऐसे प्रावधान जोड़े, जिससे किसान हित, देशी बीजों की सुरक्षा और खाद्य आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो सके.
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