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लीची में नए कीट और रोगों का बढ़ा खतरा, उत्पादन पर असर

New pests in litchi

मुजफ्फरपुर: लीची में नए कीट और रोगों का खतरा इन दिनों तेजी से बढ़ता जा रहा है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर प्रबंधन न होने पर किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पहले जहां फल बेधक कीट प्रमुख समस्या था, वहीं अब स्टिंक बग, फ्लावर वेबर और मंजर व फल झुलसा रोग नई चुनौतियों के रूप में सामने आए हैं।

नए कीटों का बढ़ता प्रकोप किसानों के लिए चिंता

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार स्टिंक बग का प्रकोप वर्ष दो हजार इक्कीस से लगातार बढ़ रहा है। यह कीट पौधों के कोमल हिस्सों जैसे नई कलियां, पत्तियां, पुष्पक्रम और विकसित हो रहे फलों पर हमला करता है। इसके रस चूसने से कलियां सूख जाती हैं और फल काले पड़ने लगते हैं। इसके कारण फूल और छोटे फल समय से पहले गिर जाते हैं, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।

फ्लावर वेबर बना नई समस्या

पिछले दो से तीन वर्षों में फ्लावर वेबर कीट लीची के लिए एक नई बड़ी समस्या बनकर उभरा है। यह कीट मंजर आने के साथ ही सक्रिय हो जाता है और इसके पिल्लू फूलों की कलियों को खाना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे ये पूरे पुष्पक्रम को जाले में लपेटकर अंदर ही खाते रहते हैं और डंठलों में छेद कर देते हैं। इसका असर यह होता है कि मंजर पूरी तरह खराब हो जाते हैं और बाद में बनने वाले फलों में भी बड़े छेद दिखाई देते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पूरा पेड़ झुलसा हुआ प्रतीत होता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है।

मंजर और फल झुलसा रोग से बढ़ी परेशानी

मंजर और फल झुलसा रोग भी लीची उत्पादन के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। इस रोग के कारण मंजर सूख जाते हैं और उनमें फल नहीं लग पाते। प्रभावित मंजर देखने में ऐसे लगते हैं जैसे तेज धूप से जल गए हों। यदि शुरुआती अवस्था में मंजर बच भी जाएं, तो बाद में फल झुलसकर खराब हो सकते हैं। तुड़ाई के बाद भी यह समस्या खत्म नहीं होती, क्योंकि रोग फैलाने वाले कारक फलों में सड़न पैदा कर देते हैं, जिससे बाजार में उनकी गुणवत्ता घट जाती है।

बढ़ती लागत से किसान परेशान

इन नए कीटों और रोगों से बचाव के लिए किसानों को अब अधिक मात्रा में दवाइयों का छिड़काव करना पड़ रहा है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है और लाभ कम हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर उचित प्रबंधन और जागरूकता से ही इन समस्याओं से बचा जा सकता है, अन्यथा लीची उत्पादन पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

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