पशुपालन

नया भूसा पशुओं के लिए बन रहा है परेशानी की वजह

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नई दिल्ली: इस समय बाजार में गेहूं की कटाई के चलते भरपूर मात्रा में भूसा आ रहा है, जिसे कई स्थानों पर तूड़ी भी कहा जाता है। सस्ता होने के कारण बड़ी संख्या में पशुपालक नया भूसा खरीद रहे हैं, जबकि जिन किसानों के घरों में हाल ही में गेहूं की कटाई हुई है, उनके पास पहले से ही पर्याप्त मात्रा में भूसा मौजूद है। ऐसे में पशुओं को अधिक मात्रा में नया भूसा खिलाया जा रहा है, जिसके कारण पेट दर्द, दस्त और दूध उत्पादन में कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

नया भूसा बन रहा है बीमारियों का कारण

पशु विशेषज्ञों के अनुसार नया भूसा सीधे खिलाने से पशुओं में कई तरह की बीमारियां देखने को मिलती हैं। खासकर पाचन संबंधी समस्याएं जैसे कब्ज, दस्त और बदहजमी आम हो जाती हैं। नया भूसा पूरी तरह सूखा और संतुलित न होने के कारण यह पशुओं के पाचन तंत्र पर असर डालता है, जिससे पेट फूलना और मरोड़ जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।

ऐसे खिलाएं नया भूसा

पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि नया भूसा सीधे पशुओं को न खिलाएं, बल्कि कुछ सावधानियां अपनाएं। नए भूसे को पुराने भूसे के साथ मिलाकर देना चाहिए और कम से कम दो दिन तक अच्छी तरह सुखाने के बाद ही उपयोग करना चाहिए। भूसे पर पानी और नमक का हल्का छिड़काव करने से वह मुलायम हो जाता है, जिससे पशु उसे आसानी से पचा पाते हैं।

इसके अलावा नए भूसे के साथ गुड़ या पाचन चूरन देना फायदेमंद रहता है। हरा चारा मिलाकर खिलाने से भी पाचन बेहतर रहता है। नया भूसा धीरे-धीरे सात से दस दिनों में पशुओं के आहार में शामिल करना चाहिए, शुरुआत में पुराने भूसे की मात्रा अधिक रखनी चाहिए।

पाचन सुधारने के लिए अपनाएं उपाय

विशेषज्ञों के अनुसार भूसे को छानकर कुछ घंटों के लिए भिगोना भी लाभकारी होता है। पशुओं को सेंधा नमक, हरड़ और हींग जैसे प्राकृतिक पदार्थ देने से पाचन में सुधार होता है। साथ ही पाचन क्षमता बढ़ाने के लिए उपयोगी तत्व भी दिए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर पशु चिकित्सक की सलाह से तेल का उपयोग कर कब्ज की समस्या को दूर किया जा सकता है।

दूध उत्पादन पर भी पड़ता है असर

विशेषज्ञों का कहना है कि नया भूसा अधिक मात्रा में खिलाने से सबसे बड़ा असर दूध उत्पादन पर पड़ता है। पशुओं की पाचन क्षमता कमजोर होने से दूध की मात्रा घटने लगती है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए सलाह दी जाती है कि कम से कम पंद्रह से बीस दिन पुराना भूसा ही पशुओं को खिलाया जाए, ताकि उनकी सेहत बनी रहे और उत्पादन प्रभावित न हो।

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