पशुपालन

बरसात में खुरपका-मुंहपका से पशुओं को कैसे बचाएँ?

Mouth Disease

नई दिल्ली, 20 जुलाई 2026: बरसात का मौसम पशुपालकों के लिए सतर्क रहने का समय होता है। इस दौरान पशुओं में खुरपका-मुंहपका रोग फैलने का खतरा काफी बढ़ जाता है। जिन पशुओं के खुर दो भागों में बंटे होते हैं और उनके बीच जगह होती है, उनमें यह रोग तेजी से फैल सकता है। पशु विशेषज्ञों के अनुसार बरसात के मौसम में जलभराव, दूषित पानी, गंदा चारा और संक्रमण इस रोग के फैलने के प्रमुख कारण हैं। समय पर टीकाकरण और उचित देखभाल से इस बीमारी से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है।

खुरपका-मुंहपका रोग क्यों बढ़ता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के दौरान खेतों और पशुशालाओं में पानी भर जाने से संक्रमण तेजी से फैलता है। ऐसे में पशु यदि दूषित पानी पी लें या सड़ा-गला चारा खा लें तो उनके संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है। यह रोग अत्यधिक संक्रामक होता है और एक संक्रमित पशु से दूसरे पशु में बहुत तेजी से फैल सकता है। इस बीमारी के कारण पशुओं के खुरों में घाव बन जाते हैं और मुंह में दर्दनाक छाले पड़ जाते हैं। इससे पशु का खाना-पीना लगभग बंद हो जाता है। खुरों में घाव होने के कारण पशु न तो ठीक से चल पाता है और न ही लंबे समय तक खड़ा रह पाता है। गंभीर स्थिति में दुग्ध उत्पादन भी प्रभावित होता है और आर्थिक नुकसान बढ़ जाता है।

ऐसे पहचानें बीमारी के लक्षण

खुरपका-मुंहपका रोग से प्रभावित पशुओं में कई स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं। पशुओं को तेज बुखार आता है, उनकी भूख कम हो जाती है और वे सुस्त रहने लगते हैं। मुंह से लगातार अधिक मात्रा में लार गिरती रहती है तथा जीभ और मसूड़ों पर छाले बन जाते हैं। इसके कारण पशु चारा खाने में असमर्थ हो जाता है। रोग बढ़ने पर खुरों के बीच घाव बन जाते हैं, जिससे चलने में कठिनाई होती है। कई मामलों में गर्भवती पशुओं का गर्भपात भी हो सकता है। इसके अलावा थनों में सूजन, दुग्ध उत्पादन में कमी तथा प्रजनन संबंधी समस्याएं भी देखने को मिल सकती हैं।

किन कारणों से फैलता है संक्रमण?

दूषित चारा और गंदा पानी इस रोग के सबसे बड़े कारण माने जाते हैं। बरसात के दौरान खुले में चरने वाले पशु अक्सर संक्रमित चारा और पानी के संपर्क में आ जाते हैं। सड़ी-गली वस्तुएं खाने से भी संक्रमण फैल सकता है। यदि किसी पशुशाला में नया पशु लाया जाए और वह पहले से संक्रमित हो, तो वह अन्य पशुओं में भी रोग फैला सकता है। संक्रमित पशु के सीधे संपर्क में आने से भी यह बीमारी तेजी से फैलती है।

बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय

विशेषज्ञों का कहना है कि इस रोग से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका समय पर टीकाकरण है। प्रत्येक पशुपालक को अपने पशुओं का पंजीकरण कराना चाहिए और उनके कान में पहचान के लिए निशान लगवाना चाहिए। पशु स्वास्थ्य केंद्रों पर वर्ष में दो बार निःशुल्क टीकाकरण कराया जाता है, जिसका लाभ अवश्य उठाना चाहिए।

टीका लगने के बाद भी लगभग 10 से 15 दिनों तक विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इसी अवधि में पशु के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। बरसात के मौसम में पशुओं के रहने की जगह को साफ, सूखा और स्वच्छ रखना, उन्हें केवल स्वच्छ पानी और अच्छा चारा देना तथा बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना संक्रमण रोकने के लिए बेहद आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर टीकाकरण, स्वच्छता और सतर्कता अपनाकर पशुपालक खुरपका-मुंहपका रोग से अपने पशुओं की सुरक्षा कर सकते हैं और बड़े आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं।

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