नई दिल्ली: जून महीने में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण देशभर में खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होने से किसान धान, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई को लेकर इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में अब किसानों और कृषि क्षेत्र की निगाहें जुलाई के मानसून पर टिकी हैं, क्योंकि आने वाले दिनों की वर्षा इस वर्ष की खेती और खाद्य उत्पादन की दिशा तय करेगी।
सामान्य से कम वर्षा ने बढ़ाई किसानों की चिंता
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 29 जून तक देश में सामान्य से लगभग 33 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ा है। 25 जून तक खरीफ फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत कम दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होने के कारण किसान धान, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी फसलों की बुवाई शुरू करने से बच रहे हैं। यदि जुलाई के पहले पखवाड़े में अच्छी वर्षा होती है तो बुवाई की गति तेज होने की संभावना है।
प्रमुख जलाशयों में पिछले वर्ष से कम पानी
खेती के लिए जल उपलब्धता को लेकर केंद्रीय जल आयोग की 18 जून 2026 की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 166 प्रमुख बांधों में इस समय लगभग 50.457 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है, जो उनकी कुल भंडारण क्षमता का लगभग 27.49 प्रतिशत है। यह मात्रा पिछले वर्ष की तुलना में कम है। पिछले वर्ष इसी अवधि में इन बांधों में लगभग 58.249 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध था। हालांकि राहत की बात यह है कि यह जल भंडारण पिछले दस वर्षों के औसत से अधिक बना हुआ है, जिससे आने वाले समय में सिंचाई व्यवस्था को कुछ सहारा मिल सकता है।
मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में बेहतर जल भंडारण
देश के विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति पर नजर डालें तो मध्य और उत्तरी राज्यों में जल भंडारण अपेक्षाकृत बेहतर बना हुआ है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ सहित मध्य क्षेत्र के जलाशयों में कुल क्षमता का लगभग 33.77 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान जैसे उत्तरी राज्यों के जलाशयों में लगभग 33.17 प्रतिशत जल भंडारण दर्ज किया गया है। इन दोनों क्षेत्रों में जल उपलब्धता पिछले वर्ष और पिछले दस वर्षों के औसत की तुलना में बेहतर स्थिति में बताई गई है।
पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में गहराया जल संकट
इसके विपरीत पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में जल संकट अधिक गंभीर बना हुआ है। बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के जलाशयों में कुल क्षमता का केवल लगभग 20.89 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में भी जलाशयों में मात्र लगभग 21.34 प्रतिशत पानी बचा है। पिछले वर्ष की तुलना में यह स्थिति काफी कमजोर मानी जा रही है, जिससे सिंचाई और कृषि गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
विभिन्न नदी क्षेत्रों में अलग-अलग स्थिति
नदी क्षेत्रों के आधार पर भी जल उपलब्धता में अंतर दिखाई दे रहा है। गंगा, सिंधु, नर्मदा, माही, तापी, साबरमती, गोदावरी और महानदी जैसे प्रमुख नदी क्षेत्रों में जल भंडारण सामान्य से बेहतर बताया गया है। वहीं कृष्णा और सुवर्णरेखा नदी क्षेत्रों में भी जल स्तर सामान्य के आसपास बना हुआ है। हालांकि कावेरी नदी क्षेत्र तथा महानदी और पेन्नार के बीच स्थित पूर्वी नदी क्षेत्रों में जल की कमी बनी हुई है, जिससे वहां के किसानों की चिंता बढ़ गई है।
जुलाई के मानसून से बंधी किसानों की उम्मीद
मौसम विभाग के अनुसार अगले दो से तीन दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के फिर सक्रिय होने की संभावना है। इसके प्रभाव से गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के शेष क्षेत्रों में वर्षा की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। वहीं कोंकण, गोवा और महाराष्ट्र के कई इलाकों में भारी वर्षा होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई के पहले पंद्रह दिनों में अच्छी वर्षा होती है तो खरीफ फसलों की बुवाई में हुई शुरुआती कमी की काफी हद तक भरपाई संभव हो सकती है। ऐसे में किसानों के साथ-साथ देश की कृषि अर्थव्यवस्था भी अब जुलाई के मानसून पर निर्भर करती दिखाई दे रही है।
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