नई दिल्ली: हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की 6.5 प्रतिशत वृद्धि दर के मुकाबले एक बड़ी छलांग मानी जा रही है. इस अनुमान के साथ भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत करता दिख रहा है. भारत की GDP जीडीपी अब लगभग 201.90 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद जताई गई है, जो आर्थिक मजबूती का स्पष्ट संकेत है.
सर्विस सेक्टर बना ग्रोथ का इंजन
इस आर्थिक रफ्तार में सबसे बड़ा योगदान सर्विस सेक्टर का रहा है. बैंकिंग, रियल एस्टेट, आईटी और फाइनेंशियल सर्विसेज के दम पर यह सेक्टर 9.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है. वहीं उद्योग क्षेत्र भी पीछे नहीं है और इसमें 7.0 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि देखी जा रही है. इससे साफ है कि घरेलू मांग, निवेश और बुनियादी ढांचे पर सरकार के जोर का असर जमीन पर दिख रहा है.
कृषि क्षेत्र में फिर लौटी रफ्तार
वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन की विकास दर 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है. भले ही यह आंकड़ा उद्योग और सेवाओं की तुलना में कम दिखे, लेकिन यह क्षेत्र देश की लगभग 46 प्रतिशत आबादी की आजीविका का आधार है. अच्छी बारिश और सरकारी समर्थन ने पिछले साल की सुस्ती के बाद कृषि क्षेत्र में नई जान फूंक दी है. गांवों में आमदनी बढ़ने से ट्रैक्टर, मोबाइल, कपड़े और रोजमर्रा की वस्तुओं की मांग भी बढ़ रही है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था को सहारा मिल रहा है.
मानसून की मेहरबानी और स्मार्ट खेती का दौर
भारतीय कृषि के लिए मानसून हमेशा से रीढ़ की हड्डी रहा है. इस साल अनुकूल बारिश ने खेतों में हरियाली लौटाई है. खरीफ फसलों का बुवाई रकबा बढ़कर 110.5 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो बेहतर पैदावार के संकेत देता है. अब खेती सिर्फ बारिश पर निर्भर नहीं रही. ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सटीक सिंचाई और डेटा आधारित खेती जैसी स्मार्ट तकनीकों ने लागत घटाकर उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
डेयरी, मत्स्य पालन और फूड प्रोसेसिंग बने गेम-चेंजर
डेयरी और मत्स्य पालन जैसे सहयोगी क्षेत्रों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी है. इसके साथ ही खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ा परिवर्तनकारी कदम बनकर उभरा है. कच्चे कृषि उत्पादों को वैल्यू-एडेड उत्पादों में बदलने से उनकी कीमत और shelf life दोनों बढ़ रही हैं. टमाटर से सॉस और दूध से पनीर जैसे उत्पाद किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर रहे हैं. विनिर्माण क्षेत्र में करीब 10 प्रतिशत योगदान देने वाला यह सेक्टर 8-9 प्रतिशत की तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा है.
सरकारी योजनाएं और कृषि निर्यात में बढ़ोतरी
किसानों की आय बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ‘पीएम-किसान’ जैसी योजनाओं के जरिए सीधे बैंक खातों में आर्थिक सहायता पहुंचा रही है. वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में इस योजना के लिए 63,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. सरकार का फोकस फसल कटाई के बाद के प्रबंधन पर है ताकि उपज की बर्बादी रोकी जा सके. इसका असर निर्यात पर भी दिख रहा है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कृषि निर्यात में 7.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. चावल, फल, सब्जियां और मांस निर्यात से देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिल रही है.
कृषि क्षेत्र के सामने चुनौतियां भी बरकरार
इतनी सकारात्मक तस्वीर के बावजूद कृषि क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं. जलवायु परिवर्तन, मानसून की अनिश्चितता, बढ़ती उत्पादन लागत और छोटे किसानों तक आधुनिक तकनीक की सीमित पहुंच अब भी चिंता का विषय है. भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के लिए कृषि क्षेत्र को और अधिक सशक्त बनाना जरूरी है. कृषि का योगदान केवल जीडीपी के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सामाजिक स्थिरता और खुशहाली से भी गहराई से जुड़ा है.
लहलहाते खेत ही विकसित भारत की पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसानों को तकनीक, बाजार और फूड प्रोसेसिंग से सही तरीके से जोड़ा गया, तो भारत की आर्थिक रफ्तार को रोकना मुश्किल होगा. मजबूत कृषि, तेज़ी से बढ़ता सर्विस सेक्टर और उद्योगों की स्थिर प्रगति मिलकर भारत को एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रहे हैं. साफ है कि लहलहाते खेत ही विकसित भारत की असली पहचान हैं.
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