कृषि समाचार

महाराष्ट्र में अंगूर एक्सपोर्ट के लिए बागों का रजिस्ट्रेशन 28 फीसदी घटा

Grape export in Maharashtra

नासिक: महाराष्ट्र के नासिक जिले में अंगूर के बाग आमतौर पर इस समय हरियाली और उम्मीद से भरे रहते हैं, लेकिन इस साल हालात बदले हुए हैं। कई बागों में लताएं तो मौजूद हैं, मगर उन पर फल कम दिखाई दे रहे हैं। जहां गुच्छे बनने चाहिए थे, वहां खाली टहनियां नजर आ रही हैं। इसी वजह से इस बार महाराष्ट्र में अंगूर एक्सपोर्ट के लिए बागों का रजिस्ट्रेशन बुरी तरह गिर गया है।

एपीडा के नियमों के अनुसार, जिन किसानों को अंगूर विदेश भेजने होते हैं, उन्हें पहले अपने बाग का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है। यह प्रक्रिया जिले के कृषि कार्यालयों के जरिए होती है। लेकिन इस सीजन में किसानों का भरोसा टूटता नजर आ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में अब तक सिर्फ 30,747 किसानों ने 19,400 हेक्टेयर बागों का रजिस्ट्रेशन कराया है, जबकि पिछले साल 42 हजार किसानों और करीब 26,879 हेक्टेयर बाग दर्ज हुए थे। यानी रजिस्ट्रेशन में करीब 28 फीसदी की गिरावट आई है।

नासिक सबसे बड़ा एक्सपोर्ट हब

नासिक, जिसे महाराष्ट्र का सबसे बड़ा अंगूर एक्सपोर्ट हब माना जाता है, वहां हालात और भी खराब हैं। पिछले साल जहां 18,496 हेक्टेयर बाग एक्सपोर्ट के लिए दर्ज थे, इस बार यह आंकड़ा घटकर 12,790 हेक्टेयर रह गया है। नासिक के अलावा अहिल्यानगर, पुणे, सांगली, धाराशिव, सोलापुर और सातारा जैसे जिलों में भी किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराने से दूरी बना ली है।

जुन्नर के अंगूर किसान प्रकाश वाघ का कहना है कि मई की बारिश ने उनकी फसल बर्बाद कर दी। उनके मुताबिक, “एक्सपोर्ट लायक अंगूर ही नहीं बचे। जब क्वालिटी नहीं है, तो रजिस्ट्रेशन कराने का क्या मतलब?” उनका कहना है कि इसका असर सीधे बाजार पर पड़ेगा और लोकल व विदेशी दोनों मार्केट में अंगूर महंगे हो सकते हैं।

मई-जून की बारिश ने किया बर्बाद

जुन्नर के ही एक अन्य किसान गुलाबराव नेहरकर बताते हैं कि पिछले साल मई से जून के बीच हुई लगातार बारिश ने पौधों की ताकत छीन ली। “सूरज की रोशनी नहीं मिली, फोटोसिंथेसिस नहीं हो पाया। फूल कम आए और फल उससे भी कम बने। जब अंगूर ही नहीं हैं, तो किसान रजिस्ट्रेशन क्यों कराएंगे?”

मौसम की मार अभी भी जारी है। रात में तापमान गिरने और कोहरे के कारण पत्तियों पर ओस जम जाती है, जबकि दिन में तेज गर्मी से अंगूर के दाने फट रहे हैं। ऐसे फटे हुए फल न तो एक्सपोर्ट में स्वीकार होते हैं और न ही लोकल बाजार में अच्छे दाम दिला पाते हैं।

आने वाले महीनों में घटेगी सप्लाई

इस हालात का असर बाजार में दिखने लगा है। किसानों के अनुसार, इस सीजन में एक्सपोर्ट के मुकाबले लोकल मार्केट में ज्यादा फायदा मिल रहा है, जहां कुछ जगहों पर अंगूर 120 से 150 रुपये किलो तक बिक रहे हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि यह राहत अस्थायी है।

एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इस साल अंगूर के उत्पादन में 50 फीसदी तक और एक्सपोर्ट में करीब 40 फीसदी की गिरावट आ सकती है। इसका सबसे बड़ा झटका नासिक को लगेगा, जिसकी महाराष्ट्र के कुल अंगूर एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी करीब 75 फीसदी तक मानी जाती है। खेतों में पसरा सन्नाटा और किसानों की चिंता इस बात का साफ संकेत है कि इस बार अंगूर का सीजन न किसानों के लिए आसान होगा और न ही भारत के एक्सपोर्ट आंकड़ों के लिए।

ये भी पढ़ें: गन्ने की खेती में इंटरक्रॉपिंग से किसानों की आमदनी बढ़ाने का नया रास्ता

Related posts

Leave a Comment